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Thursday, June 18, 2026

रामलला की आस्था पर उठते सवाल: क्या करोड़ों के खर्च का हिसाब देने से बच रहा है ट्रस्ट

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शरद कटियार

अयोध्या में भगवान श्रीराम का भव्य मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि करोड़ों हिंदुओं की सदियों पुरानी आस्था, संघर्ष और विश्वास का प्रतीक है। इस मंदिर के निर्माण के लिए देश के कोने-कोने से लोगों ने अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान दिया। किसी ने हजारों रुपये दिए तो किसी ने अपनी जमा पूंजी तक समर्पित कर दी। लोगों का विश्वास था कि उनकी ओर से दिया गया प्रत्येक रुपया भगवान राम के कार्य और श्रद्धालुओं की सुविधाओं में पूरी पारदर्शिता के साथ खर्च होगा। लेकिन हाल के दिनों में राम मंदिर ट्रस्ट के वित्तीय लेन-देन और खर्चों को लेकर सामने आई जानकारियों ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

वित्तीय दस्तावेजों के अनुसार अप्रैल 2025 से फरवरी 2026 के बीच सुरक्षा व्यवस्था पर लगभग 10 करोड़ रुपये और भोग-प्रसाद मद में करीब 11 करोड़ रुपये खर्च किए गए। यानी केवल इन दो मदों में ही करीब 21 करोड़ रुपये से अधिक की राशि खर्च दिखाई गई है। यह आंकड़ा अपने आप में इतना बड़ा है कि इसके बारे में विस्तृत जानकारी सार्वजनिक होना आवश्यक हो जाता है। आखिर यह पैसा कहां खर्च हुआ, किन एजेंसियों को भुगतान किया गया, किस आधार पर व्यय स्वीकृत किया गया और उसका लाभ क्या मिला? ये ऐसे प्रश्न हैं जिनका उत्तर श्रद्धालु जानना चाहते हैं।

सबसे बड़ा सवाल सुरक्षा व्यवस्था को लेकर है। राम मंदिर देश के सबसे संवेदनशील और सुरक्षित धार्मिक स्थलों में गिना जाता है। यहां उत्तर प्रदेश पुलिस, पीएसी, विशेष सुरक्षा इकाइयां और आधुनिक सीसीटीवी निगरानी व्यवस्था पहले से मौजूद हैं। केंद्र और प्रदेश सरकार लगातार सुरक्षा व्यवस्था पर संसाधन खर्च कर रही हैं। ऐसे में ट्रस्ट द्वारा अलग से लगभग 10 करोड़ रुपये खर्च किए जाने की जरूरत क्यों पड़ी? यदि यह राशि निजी सुरक्षा, उपकरणों, निगरानी तंत्र या अन्य व्यवस्थाओं पर खर्च हुई है तो उसका पूरा विवरण सार्वजनिक क्यों नहीं किया जा रहा? जब मंदिर जनता के दान से संचालित हो रहा है तो जनता को जानकारी देना ट्रस्ट का दायित्व भी है और कर्तव्य भी।

भोग-प्रसाद मद में करीब 11 करोड़ रुपये का खर्च भी चर्चा का विषय बन गया है। इसका अर्थ है कि हर महीने लगभग एक करोड़ रुपये इस मद में खर्च किए गए। निस्संदेह मंदिर में प्रतिदिन हजारों श्रद्धालु आते हैं, पूजा-पाठ और धार्मिक अनुष्ठान होते हैं, लेकिन इतनी बड़ी राशि के खर्च को लेकर स्पष्ट जानकारी सामने आना आवश्यक है। आखिर प्रसाद की खरीद, वितरण और अन्य व्यवस्थाओं पर कितना खर्च हुआ? क्या इसके लिए कोई स्वतंत्र ऑडिट या निगरानी तंत्र मौजूद है? जब आंकड़े इतने बड़े हों तो सवाल उठना स्वाभाविक है।

स्थिति इसलिए भी अधिक गंभीर हो जाती है क्योंकि इसी अवधि में दान पेटियों और दानराशि के प्रबंधन को लेकर कथित अनियमितताओं की चर्चाएं भी सामने आई हैं। यदि करोड़ों रुपये सुरक्षा व्यवस्था पर खर्च किए जा रहे थे, तो फिर दान पेटियों की निगरानी और पारदर्शिता को लेकर सवाल क्यों उठे? यह विरोधाभास लोगों के मन में संदेह पैदा करता है। आस्था का केंद्र होने के कारण राम मंदिर से जुड़ी किसी भी वित्तीय अनियमितता की आशंका सामान्य संस्थाओं की तुलना में कहीं अधिक संवेदनशील हो जाती है।

सूत्रों के माध्यम से यह भी चर्चा सामने आई है कि ट्रस्ट के भीतर निर्णय लेने और वित्तीय स्वीकृतियों की प्रक्रिया को लेकर असहमति है। यदि वास्तव में महत्वपूर्ण फैसले सीमित दायरे में लिए जा रहे हैं और सभी संबंधित लोगों को पूरी जानकारी नहीं मिल रही, तो यह स्थिति भविष्य में और बड़े विवादों को जन्म दे सकती है। किसी भी धार्मिक और सार्वजनिक संस्था की विश्वसनीयता उसकी पारदर्शिता से बनती है, न कि गोपनीयता से।

यह भी ध्यान रखना होगा कि राम मंदिर ट्रस्ट केवल कानूनी संस्था नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की भावनाओं का प्रतिनिधि है। यहां आने वाला दान किसी व्यवसायिक निवेश की तरह नहीं होता, बल्कि श्रद्धा और विश्वास का प्रतीक होता है। इसलिए ट्रस्ट पर सामान्य संस्थाओं की तुलना में अधिक नैतिक जिम्मेदारी है। हर बड़े खर्च का सार्वजनिक लेखा-जोखा, नियमित ऑडिट रिपोर्ट और वित्तीय पारदर्शिता सुनिश्चित करना समय की मांग है।

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