पीपल के पत्तों का ताजिया कर्बला में रखा
फर्रुखाबाद। जिले में करीब 180 वर्ष पुरानी धार्मिक परंपरा के तहत चेहल्लुम के अगले दिन पीपल के पत्तों से तैयार विशेष ताजिया देर रात कर्बला में रखा गया। हिंदू-मुस्लिम एकता, आपसी भाईचारे और साझा सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक माने जाने वाले इस आयोजन में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने भाग लिया। देर शाम निकला जुलूस शहर के विभिन्न प्रमुख मार्गों से होकर कर्बला पहुंचा, जहां धार्मिक रीति-रिवाजों के अनुसार ताजिए को स्थापित किया गया।
कार्यक्रम की शुरुआत मजलिस के आयोजन से हुई, जिसमें कर्बला के शहीदों और हज़रत इमाम हुसैन की कुर्बानी को याद किया गया। वक्ताओं ने कहा कि कर्बला का संदेश सत्य, न्याय, इंसानियत और बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है। लोगों से समाज में प्रेम, भाईचारा और आपसी सौहार्द बनाए रखने की अपील भी की गई।
मजलिस के बाद पीपल के पत्तों से सजे विशेष ताजिए का जुलूस गुदड़ी, पक्का पुल, रकाबगंज और टाउन हॉल तिराहा सहित विभिन्न मार्गों से होकर निकला। रास्ते में श्रद्धालुओं ने अकीदत के साथ जुलूस में भाग लिया और देर रात ताजिए को कर्बला में स्थापित किया गया।
बताया गया कि इस अनोखे ताजिए को तैयार करने में कई दिन लगते हैं। पहले लकड़ी का ढांचा बनाया जाता है, फिर कागज और पट्टी की सहायता से उसे आकार दिया जाता है। इसके बाद पूरे ताजिए को पीपल के पत्तों से सजाया जाता है, जिससे इसकी अलग पहचान बनती है।
यह परंपरा वर्षों से जिले में सांप्रदायिक सौहार्द और गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल मानी जाती है। पीपल का वृक्ष दोनों समुदायों की आस्था से जुड़ा होने के कारण उसके पत्तों से बने इस ताजिए का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है।
जुलूस को शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न कराने के लिए प्रशासन की ओर से व्यापक सुरक्षा व्यवस्था की गई थी। पूरे मार्ग पर पुलिस बल तैनात रहा और आयोजन शांतिपूर्ण माहौल में संपन्न हुआ।


