41 C
Lucknow
Sunday, April 19, 2026

महिला आरक्षण पर सियासी संग्राम: अधिकार या राजनीति

Must read

नई दिल्ली में संसद के भीतर महिला आरक्षण और उससे जुड़े संविधान संशोधन को लेकर जो तीखी बहस सामने आई है, वह केवल एक विधायी प्रक्रिया नहीं, बल्कि देश की लोकतांत्रिक प्राथमिकताओं की परीक्षा भी है। सत्ता पक्ष इसे महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी बढ़ाने की दिशा में ऐतिहासिक कदम बता रहा है, वहीं विपक्ष इसे परिसीमन से जोड़कर लागू करने की मंशा पर सवाल खड़े कर रहा है।
वास्तव में, महिला आरक्षण का मुद्दा नया नहीं है। दशकों से यह मांग उठती रही है कि संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित की जाए। वर्ष 2023 में इसे लेकर सर्वसम्मति बनने के बाद उम्मीद जगी थी कि अब यह कानून जल्द लागू होगा। लेकिन अब जब इसे परिसीमन जैसी प्रक्रिया से जोड़ा जा रहा है, तो यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या इससे इसके क्रियान्वयन में अनावश्यक देरी नहीं होगी?
विपक्ष का तर्क है कि महिला आरक्षण को तत्काल प्रभाव से लागू किया जाना चाहिए, न कि इसे जनगणना और परिसीमन जैसी जटिल प्रक्रियाओं के साथ जोड़कर लंबित किया जाए। उनका यह भी कहना है कि यदि राजनीतिक इच्छाशक्ति मजबूत हो, तो मौजूदा ढांचे में भी इसे लागू किया जा सकता है। यह चिंता इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी अभी भी अपेक्षाकृत कम है और हर देरी इस असमानता को और लंबा खींचती है।
दूसरी ओर, सरकार का पक्ष यह है कि एक व्यवस्थित और दीर्घकालिक समाधान के लिए परिसीमन के बाद ही आरक्षण लागू करना अधिक तार्किक और प्रभावी होगा। उनका मानना है कि इससे सीटों का संतुलित पुनर्विन्यास होगा और आरक्षण का लाभ अधिक व्यापक रूप से मिल सकेगा।
इस पूरे विवाद में सबसे अहम सवाल यह है कि क्या महिला आरक्षण वास्तव में प्राथमिकता है, या फिर यह राजनीतिक रणनीति का हिस्सा बनकर रह गया है? यदि सभी दल महिलाओं के सशक्तिकरण के पक्षधर हैं, तो फिर सहमति का रास्ता क्यों नहीं निकल पा रहा?
यह भी ध्यान देने योग्य है कि महिला आरक्षण केवल संख्या बढ़ाने का सवाल नहीं है, बल्कि यह निर्णय-निर्माण प्रक्रिया में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करने का प्रयास है। जब तक संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की पर्याप्त उपस्थिति नहीं होगी, तब तक नीतियों में उनकी दृष्टि और अनुभव का समुचित प्रतिनिधित्व संभव नहीं है।
ऐसे में आवश्यकता इस बात की है कि सत्ता और विपक्ष दोनों इस मुद्दे को राजनीतिक लाभ-हानि के तराजू पर तौलने के बजाय व्यापक सामाजिक हित के दृष्टिकोण से देखें। महिला आरक्षण को लेकर टकराव की बजाय सहमति बनाना ही लोकतंत्र की परिपक्वता का परिचायक होगा।
अंततः, देश की आधी आबादी केवल वादों और बहसों की नहीं, बल्कि ठोस कार्रवाई की अपेक्षा रखती है। यह समय है कि संसद इस ऐतिहासिक अवसर को राजनीतिक संघर्ष में उलझाने के बजाय इसे वास्तविकता में बदलने की दिशा में ठोस कदम उठाए।

Must read

More articles

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Latest article