लखनऊ
लखनऊ पीठ ने उत्तर प्रदेश अवैध धर्मांतरण निषेध अधिनियम, 2021 के तहत दर्ज हो रहे झूठे मामलों की बढ़ती प्रवृत्ति पर गंभीर चिंता जताते हुए कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने इस मामले में राज्य सरकार से जवाब तलब करते हुए अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) से व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है, जिससे स्पष्ट हो सके कि ऐसे निराधार मामलों पर सरकार क्या कार्रवाई कर रही है।
न्यायमूर्ति अब्दुल मोईन और न्यायमूर्ति प्रमोद कुमार श्रीवास्तव की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान टिप्पणी की कि कई मामलों में तीसरे पक्ष द्वारा बिना पर्याप्त साक्ष्य के एफआईआर दर्ज करा दी जाती हैं, जो जांच के दौरान निराधार साबित होती हैं। इससे न केवल जांच एजेंसियों का समय और संसाधन व्यर्थ होता है, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया पर भी अनावश्यक दबाव पड़ता है।
अदालत ने विशेष रूप से यह निर्देश दिया कि राज्य सरकार यह बताए कि झूठी एफआईआर दर्ज कराने वालों के खिलाफ क्या ठोस कदम उठाए जा रहे हैं, ताकि कानून के दुरुपयोग पर रोक लगाई जा सके। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि कानून का उद्देश्य समाज में शांति और सुरक्षा बनाए रखना है, न कि इसका इस्तेमाल व्यक्तिगत द्वेष या दबाव बनाने के लिए किया जाए।
यह टिप्पणी बहराइच जिले से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान सामने आई, जिसमें तीन मुस्लिम युवकों के खिलाफ धर्मांतरण का आरोप लगाते हुए मुकदमा दर्ज कराया गया था। हालांकि, कथित पीड़िता ने मजिस्ट्रेट के समक्ष बयान देकर स्पष्ट किया कि वह बालिग है और अपनी इच्छा से संबंध में है। इस पर अदालत ने जांच प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए कहा कि मामला संदिग्ध परिस्थितियों में मोड़ ले चुका है और प्रथम दृष्टया जांच अधिकारी पर बाहरी प्रभाव की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने मामले को गंभीरता से लेते हुए शिकायतकर्ता को तलब किया और पूछा कि झूठी एफआईआर दर्ज कराने पर उनके खिलाफ कार्रवाई क्यों न की जाए। साथ ही, आरोपियों की गिरफ्तारी पर अंतरिम रोक लगाते हुए पीड़िता और संबंधित पक्षों को सुरक्षा प्रदान करने के निर्देश भी दिए गए हैं।
इस मामले की अगली सुनवाई 19 मई को निर्धारित की गई है। अदालत के इस कड़े रुख को कानून के दुरुपयोग पर अंकुश लगाने और न्यायिक प्रक्रिया की पारदर्शिता बनाए रखने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।


