(डॉ. सुधाकर आशावादी-विभूति फीचर्स)
लोकसभा में महिला आरक्षण संशोधन बिल राजनीतिक दलों की सियासी सोच के चलते पारित नहीं हो सका। यह पहला अवसर नहीं है, जब जब देश में लोकतांत्रिक सुधार की प्रक्रिया शुरू की जाती है, तब तक राजनीतिक दल अपने स्वार्थ की परिधि में अपने नफे नुकसान का आकलन करते हुए निर्णय लेते ही हैं। पक्ष और विपक्ष की दृष्टि में उस समय राष्ट्र सर्वोपरि की भावना नहीं रहती। बहरहाल महिला आरक्षण देने के तरीके तथा चुनाव क्षेत्र संबंधी परिसीमन पर सहमति इसलिए नहीं बनी, क्योंकि सत्ता के पास बिल पारित कराने हेतु अपेक्षित दो तिहाई बहुमत का अभाव था।
ऐसा नहीं है, कि सत्ता पक्ष को इसकी जानकारी न रही हो, अपने पाँव तले की धरती का सभी को पता रहता है, फिर भी प्रयास किये जाते रहते हैं। कई बार अविश्वास प्रस्ताव भी इसलिए धराशायी होते हैं, कि अविश्वास व्यक्त करने वाले वाले के पास अपेक्षित मत नहीं होते। यहाँ भी यही हुआ सत्ता पक्ष को जानकारी थी, कि संशोधन विधेयक पारित कराने के लिए पर्याप्त बहुमत नहीं है, फिर भी लंबी बहस हुई और राजनीतिक दलों के मंसूबों का खुलासा हुआ।
एक सच यह भी है, कि आम आदमी राजनीतिक दलों के स्वार्थी मंसूबों को समझता तो है, लेकिन राजनीतिक दलों द्वारा समाज में उत्पन्न की गई परिस्थितियों के सम्मुख राजनीतिक दलों को सबक सिखाने में सक्षम नहीं होता, जिसकी परिणति यही होती है, कि कभी उसे जातीय अलगाववाद का शिकार होना पड़ता है और कभी क्षेत्रीय या धार्मिक विघटनकारी विमर्श का।
देश की बहुसंख्यक आबादी का अशिक्षित और लोभी होना देश को सशक्त राष्ट्र बनने की दिशा में बढ़ने नहीं देता। आम आदमी को मुफ्त राशन, मुफ्त बिजली, मुफ्त यातायात, मुफ्त की सुविधाएं मिल जाएं, बस इतना ही उसके लिए पर्याप्त रहता है। जिसका फायदा उठाना राजनीतिक दल बखूबी जानते हैं, तभी मुफ्तखोरी बढ़ाने वाले आश्वासन देकर जनता को गुमराह करते हैं।
वैसे देखा जाए, तो देश में किसी भी प्रकार के आरक्षण का कोई औचित्य नहीं है। बरसों से महिला आरक्षण लागू है, मगर कितनी महिला जनप्रतिनिधि ऐसी हैं, जो अपने क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने में सक्षम हैं। महिला ग्राम प्रधानों या महिला जनप्रतिनिधियों की वास्तविकता यही है, कि अधिकांश महिलाएं स्वयं अपने ही क्षेत्र की समस्याएं नहीं सुलझा पाती।
उन्हें क्षेत्रीय समस्याओं के निदान के लिए अपने प्रतिनिधि की जरूरत रहती है, प्रधान पति, प्रधान पुत्र, प्रधान प्रतिनिधि की तर्ज पर उन्हें बैसाखियाँ चाहिए होती हैं। जिस देश में मात्र एक वोट के अभाव में सरकारें तक गिर जाती हों तथा देश पर चुनाव का बोझ लद जाता हो, ऐसे देश में यदि 131 वे संविधान संशोधन विधेयक को अपेक्षित दो तिहाई बहुमत नहीं मिला, तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। इतना अवश्य है, कि इस संशोधन विधेयक के गिरने से राजनीतिक दलों की महिलाओं के प्रति सोच की कलई खुल गई है।
आवश्यक यही है, कि राजनीतिक दलों की महिला विरोधी तथा राजनीतिक स्वार्थ के चलते लोकतांत्रिक मूल्यों की अवहेलना करने वाले विमर्श पर व्यापक चर्चा हो, ताकि लोकतांत्रिक सुधारों की प्रक्रिया में बाधक बने तत्वों से आम आदमी परिचित हो सके।
(विभूति फीचर्स)


