किरायेदारी मामलों में सभी वारिसों को पक्षकार बनाना जरूरी नहीं
प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने किरायेदारी कानून को लेकर एक अहम फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि मूल किरायेदार की मृत्यु के बाद बेदखली के मुकदमे में सभी कानूनी वारिसों को पक्षकार बनाना आवश्यक नहीं है। कोर्ट ने कहा कि ऐसी स्थिति में किरायेदारी ‘संयुक्त किरायेदारी’ के रूप में सभी वारिसों को हस्तांतरित होती है और किसी एक वारिस के खिलाफ भी कानूनी कार्यवाही चलाकर निर्णय लागू किया जा सकता है।
न्यायमूर्ति डॉ. योगेंद्र कुमार श्रीवास्तव की एकल पीठ ने वाराणसी निवासी आशीष कुमार अग्रवाल की याचिका खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट और पुनरीक्षण अदालत के आदेश को बरकरार रखा। कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि निचली अदालत अनावश्यक स्थगन से बचते हुए मामले की सुनवाई तेजी से करे और अधिकतम छह माह के भीतर इसका निस्तारण सुनिश्चित करे।
अदालत ने अपने निर्णय में स्पष्ट किया कि यदि किसी एक संयुक्त किरायेदार के खिलाफ बेदखली की कार्यवाही होती है, तो उसका प्रभाव अन्य सभी वारिसों पर भी लागू होगा। हालांकि, यदि कोई वारिस यह दावा करता है कि उसका हित अलग है या उसे किरायेदारी से अलग कर दिया गया है, तो उसे अपने दावे को अदालत में साबित करना होगा।
कोर्ट ने इस संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों का भी उल्लेख किया और कहा कि यह सिद्धांत उत्तर प्रदेश अर्बन बिल्डिंग एक्ट के तहत भी लागू होता है। इस फैसले से किरायेदारी विवादों में प्रक्रिया को सरल बनाने और मुकदमों के त्वरित निस्तारण में मदद मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।
मामले के अनुसार, वर्ष 2014 में चित्रकूट रामलीला समिति और अन्य की ओर से किरायेदार कृष्ण गोपाल गुप्ता की बेदखली के लिए वाद दायर किया गया था। किरायेदार की मृत्यु के बाद उनके वारिसों को लेकर विवाद उत्पन्न हुआ, जिस पर यह महत्वपूर्ण फैसला सामने आया है।


