चंडीगढ़। शुक्रवार को पंजाब की राजनीति में हुए बड़े सियासी घटनाक्रम ने आम आदमी पार्टी (आप) को गहरे संकट में डाल दिया है। पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के बेहद करीबी माने जाने वाले कई नेताओं के एक साथ पाला बदलने से ‘आप’ के अंदरूनी हालात उजागर हो गए हैं। इस घटनाक्रम ने न केवल संगठन की एकजुटता पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि पंजाब में पार्टी की सरकार की स्थिरता को लेकर भी नई चिंताएं पैदा कर दी हैं।
सूत्रों के अनुसार, भाजपा ने रणनीतिक तरीके से ‘आप’ के उन चेहरों को साधा है, जो पार्टी के संगठन और चुनावी प्रबंधन में अहम भूमिका निभाते रहे हैं। इन नेताओं के अलग होने से ‘आप’ के अंदर लंबे समय से पनप रहे असंतोष की तस्वीर अब खुलकर सामने आ गई है। यह घटनाक्रम सीधे तौर पर पार्टी के शीर्ष नेतृत्व और उसकी कार्यशैली पर भी सवाल खड़े कर रहा है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह केवल दल-बदल नहीं, बल्कि 2027 विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा की बड़ी रणनीतिक चाल है। पार्टी अब पंजाब में अकेले दम पर चुनाव लड़ने की दिशा में तेजी से कदम बढ़ा रही है और मजबूत जनाधार वाले नेताओं को जोड़कर अपनी पकड़ मजबूत करने में जुटी है।
वहीं ‘आप’ के सामने अब दोहरी चुनौती खड़ी हो गई है—एक तरफ सरकार को स्थिर बनाए रखना और दूसरी ओर संगठन को टूटने से बचाना। कार्यकर्ताओं में बढ़ती असहजता और नेताओं के बीच असंतोष पार्टी के लिए चिंता का विषय बन चुका है।
स्पष्ट है कि शुक्रवार का यह सियासी झटका आने वाले समय में पंजाब की राजनीति की दिशा तय कर सकता है। ‘आप’ जहां खुद को संभालने की कोशिश में जुटी है, वहीं भाजपा इस मौके को भुनाकर राज्य की राजनीति में बड़ा खेल करने की तैयारी में नजर आ रही है।


