नई दिल्ली/नागपुर। मोहन भागवत ने एक बार फिर भारत के वैश्विक भविष्य को लेकर बड़ा और आत्मविश्वास से भरा बयान दिया है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख ने कहा कि “भारत विश्वगुरु बनेगा, हमें इस पर भरोसा रखना चाहिए।” उनके इस बयान के बाद राजनीतिक गलियारों में नई बहस छिड़ गई है क्या यह सिर्फ वैचारिक घोषणा है या इसके पीछे कोई ठोस रणनीतिक संकेत भी छिपा है?
भागवत ने अपने संबोधन में भारत की सांस्कृतिक विरासत, आध्यात्मिक ताकत और सामाजिक संरचना को विश्व नेतृत्व का आधार बताया। उन्होंने कहा कि भारत की पहचान केवल आर्थिक या सैन्य ताकत से नहीं, बल्कि “मानवता को दिशा देने वाली सोच” से बनेगी। संघ प्रमुख के मुताबिक, दुनिया आज जिस अस्थिरता, युद्ध और वैचारिक टकराव से जूझ रही है, उसमें भारत के पास समाधान देने की क्षमता है।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह बयान ऐसे समय में आया है जब केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार लगातार भारत को ग्लोबल मंच पर मजबूत बनाने की कोशिश कर रही है। जी-20 की अध्यक्षता, वैश्विक कूटनीति में सक्रियता और ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ जैसे संदेशों के जरिए भारत अपनी सॉफ्ट पावर को बढ़ा रहा है। ऐसे में संघ प्रमुख का यह बयान उस नैरेटिव को वैचारिक समर्थन देता नजर आ रहा है।
हालांकि, विपक्ष इस बयान को लेकर सवाल भी उठा रहा है। कुछ नेताओं का कहना है कि “विश्वगुरु” बनने के दावे से पहले देश के भीतर बेरोजगारी, महंगाई और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दों को सुलझाना जरूरी है। उनका तर्क है कि जमीनी हकीकत और वैश्विक दावों के बीच बड़ा अंतर है।
दिलचस्प बात यह है कि भारत की अर्थव्यवस्था फिलहाल दुनिया की टॉप 5 अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है और कई अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स में आने वाले वर्षों में तीसरे स्थान तक पहुंचने की संभावना जताई गई है। वहीं, स्टार्टअप इकोसिस्टम, डिजिटल इंडिया और रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता जैसे कदम भारत की ताकत को और बढ़ा रहे हैं।
संघ प्रमुख का यह बयान केवल एक विचार नहीं, बल्कि एक बड़ा वैचारिक एजेंडा भी माना जा रहा है—जहां भारत खुद को सिर्फ एक देश नहीं, बल्कि वैश्विक मार्गदर्शक के रूप में स्थापित करना चाहता है। अब बड़ा सवाल यही है कि क्या “विश्वगुरु” का सपना केवल भाषणों तक सीमित रहेगा या जमीनी स्तर पर ठोस बदलाव के साथ हकीकत बनेगा?
भारत विश्वगुरु बनने की राह पर, भरोसा रखें: मोहन भागवत


