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Monday, June 8, 2026

महादेवी वर्मा के बाद फर्रुखाबाद की साहित्यिक पहचान थीं डॉ. रजनी सरीन

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– उनके जाने से अनाथ हुआ साहित्य जगत

फर्रुखाबाद। शहर की प्रख्यात समाजसेवी, साहित्य संरक्षक और हिंदी भाषा की सच्ची साधिका डॉ. रजनी सरीन के निधन ने केवल एक परिवार या सामाजिक क्षेत्र को ही नहीं, बल्कि पूरे साहित्यिक जगत को गहरे शोक में डुबो दिया है। फर्रुखाबाद की धरती, जिसने हिंदी साहित्य को महियसी महादेवी वर्मा जैसा महान व्यक्तित्व दिया, उसी पर डॉ. रजनी सरीन ने भी साहित्य, संस्कृति और हिंदी भाषा के संरक्षण का एक ऐसा अध्याय लिखा, जिसे आने वाली पीढ़ियां लंबे समय तक याद रखेंगी।
साहित्यिक संस्था “अभिव्यंजना” के माध्यम से पिछले लगभग तीन दशकों से डॉ. रजनी सरीन ने जिले में साहित्यिक चेतना को जीवित रखने का कार्य किया। ऐसे समय में जब साहित्यिक गतिविधियां लगातार सीमित होती जा रही थीं, तब उन्होंने अपने संसाधनों, समय और ऊर्जा को साहित्यकारों, कवियों और लेखकों के सम्मान और प्रोत्साहन में समर्पित कर दिया।
अभिव्यंजना केवल एक संस्था नहीं थी, बल्कि साहित्य प्रेमियों का परिवार थी और उसकी आत्मा थीं डॉ. रजनी सरीन। उनके आवास और संस्था के कार्यक्रमों में देश के नामचीन साहित्यकार, कवि, शिक्षाविद, राज्यपाल, कुलपति और सांस्कृतिक जगत की प्रतिष्ठित हस्तियां आती-जाती रहीं। फर्रुखाबाद को राष्ट्रीय साहित्यिक मानचित्र पर स्थापित करने में उनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
डॉ. रजनी सरीन की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वह साहित्य को केवल मंचीय गतिविधि नहीं मानती थीं, बल्कि उसे समाज निर्माण का माध्यम समझती थीं। युवा कवियों, लेखकों और रचनाकारों को वह खुलकर संरक्षण देती थीं। अनेक साहित्यकार ऐसे हैं जिन्हें पहली बार मंच, सम्मान और पहचान अभिव्यंजना के माध्यम से मिली।
साहित्यिक जगत में अक्सर यह कहा जाता था कि यदि फर्रुखाबाद में कोई व्यक्ति साहित्य और संस्कृति के लिए सबसे अधिक समर्पित है तो वह डॉ. रजनी सरीन हैं। उन्होंने कभी प्रसिद्धि की इच्छा नहीं की, लेकिन साहित्यकारों को सम्मान दिलाने के लिए हमेशा आगे रहीं।
उनके निधन के साथ जिले के साहित्यिक परिदृश्य में एक बड़ा शून्य पैदा हो गया है। साहित्यकारों का मानना है कि डॉ. रजनी सरीन केवल आयोजक नहीं थीं, बल्कि वह एक ऐसी संरक्षक थीं जिनके संरक्षण में साहित्यिक गतिविधियां फलती-फूलती थीं। उनके जाने के बाद साहित्य जगत स्वयं को अनाथ महसूस कर रहा है।
आज फर्रुखाबाद के साहित्यकारों, कवियों और बुद्धिजीवियों के बीच एक ही चर्चा है कि डॉ. रजनी सरीन जैसी साहित्य प्रेमी और संरक्षक हस्ती का विकल्प मिलना आसान नहीं होगा। उन्होंने जिस समर्पण और आत्मीयता के साथ हिंदी भाषा और साहित्य की सेवा की, वह अपने आप में एक मिसाल है।
महादेवी वर्मा ने फर्रुखाबाद को राष्ट्रीय साहित्यिक पहचान दिलाई थी और डॉ. रजनी सरीन ने उस परंपरा को आधुनिक समय में जीवित रखने का प्रयास किया। यही कारण है कि उनका नाम केवल समाज सेवा तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि हिंदी साहित्य और सांस्कृतिक चेतना की एक मजबूत स्तंभ के रूप में भी याद किया जाएगा।
आज जब डॉ. रजनी सरीन हमारे बीच नहीं हैं, तब उनकी स्मृतियां, उनके द्वारा स्थापित साहित्यिक परंपराएं और “अभिव्यंजना” के माध्यम से किया गया उनका योगदान ही उनकी सबसे बड़ी विरासत है। फर्रुखाबाद का साहित्यिक इतिहास जब भी लिखा जाएगा, उसमें डॉ. रजनी सरीन का नाम स्वर्णाक्षरों में दर्ज रहेगा।

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