देश में बच्चों को यौन अपराधों से सुरक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से बनाया गया पॉक्सो अधिनियम भारत के सबसे सख्त कानूनों में से एक माना जाता है। इस कानून का मूल उद्देश्य नाबालिगों को शोषण, उत्पीड़न और यौन हिंसा से बचाना है। लेकिन समय के साथ इसके क्रियान्वयन को लेकर कई सवाल भी उठने लगे हैं। अब सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणी ने इस बहस को नई दिशा दे दी है।
सर्वोच्च न्यायालय ने यह चिंता व्यक्त की है कि किशोर-किशोरियों के बीच आपसी सहमति से बने संबंधों को भी कई बार सीधे पॉक्सो के दायरे में लाकर आपराधिक मुकदमे में बदल दिया जाता है। अदालत ने संकेत दिया कि हर मामले को एक ही नजरिए से देखना न्यायसंगत नहीं हो सकता। यह टिप्पणी केवल एक मुकदमे तक सीमित नहीं है, बल्कि उस सामाजिक और कानूनी वास्तविकता की ओर इशारा करती है, जिसका सामना अदालतें लगातार कर रही हैं।
भारतीय समाज में प्रेम संबंधों को लेकर पारिवारिक और सामाजिक सोच आज भी काफी हद तक परंपराओं से प्रभावित है। जब कोई किशोर या किशोरी अपनी पसंद से संबंध बनाता है या घर छोड़कर चला जाता है, तो कई बार परिवार इसे स्वीकार नहीं कर पाता। ऐसे मामलों में अपहरण और पॉक्सो जैसी गंभीर धाराओं के तहत मुकदमे दर्ज कराए जाते हैं। अदालत की चिंता यही है कि कहीं ऐसा तो नहीं कि बच्चों की सुरक्षा के लिए बना कानून सामाजिक असहमति का हथियार बनता जा रहा हो।
हालांकि यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि इस टिप्पणी का गलत अर्थ नहीं निकाला जाए। सुप्रीम कोर्ट ने न तो पॉक्सो कानून को कमजोर करने की बात कही है और न ही यह कहा है कि सहमति के आधार पर नाबालिगों के संबंध पूरी तरह वैध हैं। अदालत ने केवल इतना कहा है कि हर मामले की परिस्थितियों को समझना आवश्यक है और कानून का उपयोग विवेकपूर्ण तरीके से होना चाहिए।
यह भी सच है कि 15 से 18 वर्ष की आयु किशोरावस्था का संवेदनशील दौर होता है। इस उम्र में भावनात्मक आकर्षण, दोस्ती और रिश्ते बनना असामान्य नहीं है। लेकिन यही उम्र निर्णय लेने की परिपक्वता और कानूनी जिम्मेदारियों के बीच संतुलन की भी मांग करती है। इसलिए ऐसे मामलों में केवल कानूनी प्रावधान ही नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक, सामाजिक और पारिवारिक पहलुओं को भी समझना जरूरी है।
दूसरी ओर, यह भी नहीं भूलना चाहिए कि पॉक्सो अधिनियम ने हजारों बच्चों को न्याय दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बाल यौन शोषण जैसे अपराधों के खिलाफ यह कानून एक मजबूत सुरक्षा कवच है। इसलिए किसी भी संभावित सुधार का उद्देश्य कानून को कमजोर करना नहीं, बल्कि उसके प्रभावी और न्यायसंगत उपयोग को सुनिश्चित करना होना चाहिए।
अब आवश्यकता इस बात की है कि सरकार, विधि आयोग, बाल अधिकार विशेषज्ञ, मनोवैज्ञानिक और न्यायपालिका मिलकर इस विषय पर गंभीर विमर्श करें। यदि कानून के क्रियान्वयन में कहीं व्यावहारिक कठिनाइयां हैं या सहमति वाले किशोर संबंधों और वास्तविक यौन अपराधों के बीच बेहतर कानूनी संतुलन की जरूरत है, तो उस पर विचार होना चाहिए। लेकिन यह प्रक्रिया व्यापक चर्चा, ठोस आंकड़ों और बाल सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता में रखकर ही आगे बढ़नी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी एक महत्वपूर्ण प्रश्न छोड़ती है,क्या हर मामला केवल कानून की धाराओं से तय होगा, या उसकी परिस्थितियों, उद्देश्य और वास्तविकता को भी समान महत्व दिया जाएगा? इसका उत्तर भविष्य की न्यायिक और विधायी दिशा तय करेगा। कानून का उद्देश्य केवल दंड देना नहीं, बल्कि न्याय सुनिश्चित करना भी है। यही संतुलन किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की सबसे बड़ी पहचान है।


