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Thursday, June 4, 2026

जवाबदेही से भागते अफसर और व्यवस्था का संकट

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शरद कटियार

उत्तर प्रदेश की प्रशासनिक व्यवस्था पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की हालिया टिप्पणी केवल एक न्यायिक टिप्पणी नहीं, बल्कि शासन और नौकरशाही के लिए गंभीर चेतावनी है। अदालत ने जिस स्पष्टता से कहा है कि अब केवल निचले कर्मचारियों को बलि का बकरा बनाकर काम नहीं चलेगा, बल्कि विभागों के शीर्ष अधिकारियों की जवाबदेही भी तय करनी होगी, वह देश की प्रशासनिक संस्कृति पर सीधा प्रहार है।

भारत की नौकरशाही में लंबे समय से एक प्रवृत्ति देखने को मिलती रही है। किसी विभाग में भ्रष्टाचार हो, किसी परियोजना में घोटाला हो, सरकारी धन की बर्बादी हो या फिर किसी नागरिक के अधिकारों का हनन हो, जांच शुरू होते ही जिम्मेदारी सबसे नीचे के कर्मचारी पर डाल दी जाती है। निलंबन चपरासी का होता है, कार्रवाई क्लर्क पर होती है, लेकिन फाइलों पर अंतिम निर्णय लेने वाले अधिकारी सुरक्षित बच निकलते हैं। यही कारण है कि व्यवस्था में जवाबदेही का संकट लगातार गहराता गया है।

हाईकोर्ट ने सही प्रश्न उठाया है कि यदि किसी विभाग में करोड़ों रुपये की परियोजना में गड़बड़ी होती है तो क्या इसकी जानकारी केवल अधीनस्थ कर्मचारियों तक सीमित रहती है? क्या वरिष्ठ अभियंता, विभागाध्यक्ष, मंडलीय अधिकारी, जिलास्तरीय अधिकारी या शासन स्तर के अधिकारी इससे पूरी तरह अनभिज्ञ रहते हैं? यदि नहीं, तो फिर कार्रवाई केवल निचले स्तर तक ही क्यों सीमित रहती है?

दरअसल, भारतीय प्रशासनिक ढांचे में अधिकार और जिम्मेदारी के बीच संतुलन लंबे समय से बिगड़ा हुआ है। वरिष्ठ अधिकारियों के पास व्यापक अधिकार हैं, लेकिन जब जवाबदेही तय करने की बात आती है तो पूरा तंत्र उन्हें बचाने में लग जाता है। यही कारण है कि कई बार भ्रष्टाचार और लापरवाही संस्थागत रूप ले लेती है। जब शीर्ष स्तर पर दंड का भय समाप्त हो जाता है तो नीचे तक संदेश जाता है कि गलतियां और अनियमितताएं अंततः दबा दी जाएंगी।

उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य में यह समस्या और अधिक गंभीर है। सड़क निर्माण से लेकर स्वास्थ्य सेवाओं तक, शिक्षा से लेकर राजस्व विभाग तक, समय-समय पर अनियमितताओं की शिकायतें सामने आती रहती हैं। जांच समितियां बनती हैं, रिपोर्टें तैयार होती हैं, लेकिन जिम्मेदारी तय करने की प्रक्रिया अक्सर अधूरी रह जाती है। परिणामस्वरूप जनता का विश्वास कमजोर होता है और सरकारी तंत्र की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लग जाता है।

हाईकोर्ट का यह सुझाव कि आवश्यकता पड़ने पर वरिष्ठ अधिकारियों की व्यक्तिगत और आपराधिक जिम्मेदारी भी तय की जाए, प्रशासनिक सुधारों की दिशा में एक महत्वपूर्ण विचार है। जब किसी अधिकारी को यह एहसास होगा कि उसके अधीन हुए गंभीर उल्लंघन के लिए उसे भी कानूनी परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं, तब निगरानी व्यवस्था स्वतः मजबूत होगी। फाइलों पर हस्ताक्षर केवल औपचारिकता नहीं रहेंगे और विभागीय निरीक्षण अधिक गंभीरता से किए जाएंगे।

हालांकि इस व्यवस्था को लागू करते समय संतुलन भी आवश्यक होगा। हर प्रशासनिक त्रुटि को आपराधिक अपराध नहीं माना जा सकता। लेकिन जहां स्पष्ट भ्रष्टाचार, कर्तव्य की घोर उपेक्षा, वित्तीय अनियमितता या कानून के जानबूझकर उल्लंघन के प्रमाण हों, वहां शीर्ष अधिकारियों को जिम्मेदारी से मुक्त नहीं छोड़ा जा सकता।

आज आवश्यकता केवल नई नीतियां बनाने की नहीं, बल्कि जवाबदेही की संस्कृति विकसित करने की है। लोकतंत्र में जनता कर देती है, सरकार योजनाएं बनाती है और नौकरशाही उन्हें लागू करती है। यदि योजनाएं असफल होती हैं, धन का दुरुपयोग होता है या नागरिकों को न्याय नहीं मिलता, तो जिम्मेदारी भी उसी अनुपात में तय होनी चाहिए।

इलाहाबाद हाईकोर्ट की टिप्पणी इस दृष्टि से ऐतिहासिक महत्व रखती है। यह केवल एक मामले की सुनवाई तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे प्रशासनिक ढांचे को आईना दिखाने वाली टिप्पणी है। अब देखना यह होगा कि शासन इस संदेश को केवल न्यायिक सलाह मानता है या इसे प्रशासनिक सुधार का आधार बनाकर जवाबदेही की नई परंपरा स्थापित करता है।

यदि व्यवस्था को वास्तव में पारदर्शी, उत्तरदायी और जनहितैषी बनाना है तो “जिम्मेदारी नीचे और अधिकार ऊपर” की पुरानी संस्कृति को समाप्त करना होगा। जवाबदेही वहीं से शुरू होनी चाहिए जहां से अधिकार शुरू होते हैं।

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