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Sunday, April 26, 2026
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कायमगंज तहसील में बवाल: फर्जी मुकदमे के विरोध में वकीलों की हड़ताल

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एसडीएम पर रिश्वतखोरी और कोतवाल पर दबाव में मुकदमा लिखने का आरोप

फर्रुखाबाद

जिले की कायमगंज तहसील में न्यायिक व्यवस्था को लेकर गंभीर विवाद खड़ा हो गया है, जहां फर्जी मुकदमा दर्ज किए जाने से आक्रोशित अधिवक्ताओं ने कामकाज ठप कर हड़ताल शुरू कर दी। अधिवक्ताओं ने उपजिलाधिकारी पर रिश्वत लेने जैसे गंभीर आरोप लगाए हैं, वहीं कायमगंज कोतवाली प्रभारी विनोद कुमार शुक्ला पर बिना जांच के मुकदमा दर्ज करने का आरोप लगाकर पुलिस प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए हैं।
मामले की जड़ में उपजिलाधिकारी न्यायालय में तैनात अहलमद फौजदारी अनुज कुमार द्वारा दर्ज कराई गई शिकायत है, जिसमें आरोप लगाया गया कि 20 अप्रैल 2026 की शाम करीब 4:45 बजे न्यायालय में राजकीय कार्य के दौरान लगभग 10 अधिवक्ताओं ने पहुंचकर हंगामा किया। शिकायत के अनुसार अधिवक्ताओं सरनेश यादव, इंद्रेश गंगवार, अवनीश गंगवार उर्फ लालू सहित अन्य ने न्यायालय परिसर में मौजूद कर्मचारियों के साथ अभद्रता की, पत्रावलियों को अस्त व्यस्त कर दिया और मुख्य द्वार को लात मारकर उसकी कुंडी तोड़ दी। इस आधार पर संबंधित अधिवक्ताओं के खिलाफ विभिन्न धाराओं में मुकदमा दर्ज कर लिया गया है।
हालांकि अधिवक्ताओं ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए इसे साजिश करार दिया है। अधिवक्ता इंद्रेश गंगवार का कहना है कि घटना के समय वह जिले में मौजूद ही नहीं थे और उनकी लोकेशन की पुष्टि के लिए मोबाइल कॉल डिटेल रिकॉर्ड (सीडीआर) और सीसीटीवी फुटेज की जांच कराई जा सकती है। उनका आरोप है कि प्रशासनिक अधिकारियों ने दबाव में आकर झूठा मुकदमा दर्ज कराया है, ताकि वकीलों की आवाज को दबाया जा सके।
वकीलों ने आरोप लगाया कि उपजिलाधिकारी स्तर पर भ्रष्टाचार चरम पर है और बिना लेन-देन के कोई कार्य नहीं हो रहा। वहीं पुलिस पर भी पक्षपातपूर्ण कार्रवाई का आरोप लगाते हुए कहा गया कि बिना किसी निष्पक्ष जांच के सीधे मुकदमा दर्ज कर दिया गया, जो न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है।
इस पूरे घटनाक्रम के बाद तहसील परिसर में तनावपूर्ण स्थिति बनी हुई है। अधिवक्ताओं ने चेतावनी दी है कि जब तक मुकदमा वापस नहीं लिया जाता और निष्पक्ष जांच नहीं होती, तब तक हड़ताल जारी रहेगी। वहीं प्रशासन की ओर से अभी तक आरोपों पर कोई स्पष्ट जवाब नहीं आया है, जिससे विवाद और गहराता जा रहा है।

काश मैं एक चिड़िया होती

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काश मैं एक चिड़िया होती ,
जो अपने अरमानो को पंखों की तरह फैला कर निडर हो जाती

काश मैं एक चिड़िया होती
छोटे-छोटे तिनकों का घोंसला बनाने की तरह मैं भी अपने अरमानो का मकान बना पाती ,

काश मैं एक चिड़िया होती
पंख पसार कर आसमान में उड़ने की तरह स्वयं को स्वतंत्र कर पाती.,

काश मैं एक चिड़िया होती,
Khhule आसमान में अपनी पहचान की तरह दुनिया में अनोखी पहचान बना पाती

काश मैं एक चिड़िया होती
जो अपना भार स्वयं सम्भाल पाती,

काश मैं एक चिड़िया होती

वाणी कटियार
बीएससी प्रथम वर्ष, रामकृष्ण महाविद्यालय रानूखेड़ा

मैदान में महिला अफसर, सियासत में आक्रामक मोहन यादव

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(पवन वर्मा -विनायक फीचर्स)
देश की राजनीति में महिलाओं को लोकसभा और विधानसभा में 33 प्रतिशत आरक्षण देने का मुद्दा गर्म है। संसद से लेकर सियासी मंचों तक इस पर तीखी बहस हो रही है। आरोप-प्रत्यारोप का दौर भी तेज है और हर दल अपने-अपने तरीके से इस मुद्दे को परिभाषित करने में जुटा है। ऐसे समय में मध्यप्रदेश की तस्वीर एक अलग ही रूप में सामने आयी है, जहां मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने महिला नेतृत्व को केवल राजनीतिक वादों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था के केंद्र में ला दिया है।
महिला आरक्षण का मुद्दा भले ही आज राष्ट्रीय राजनीति में गर्माया हो, लेकिन मध्यप्रदेश में इसके संकेत पहले ही दिखाई देने लगे थे। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने अपने कार्यकाल में महिला आईएएस और आईपीएस अधिकारियों पर जो भरोसा जताया है, वह पूर्ववर्ती सरकारों के मुखियाओं की तुलना में कहीं अधिक व्यापक और स्पष्ट नजर आता है। यही वजह है कि जब वे महिला आरक्षण से जुड़े विधेयक को लेकर विपक्ष पर हमलावर होते हैं, तो उनके तर्क केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि जमीन पर लिए गए फैसलों से भरेपूरे होते हैं।

सत्रह जिलों में महिला कलेक्टर: प्रशासन में महिलाओं की प्रभावी उपस्थिति

मध्यप्रदेश में इस समय 55 जिलों में से 17 जिलों की कमान महिला कलेक्टरों के हाथ में है। यह आंकड़ा अपने आप में यह बता रहा है कि मध्यप्रदेश के प्रशासनिक ढांचे में महिलाओं की भूमिका किस तेजी से बढ़ी है। जिन जिलों में महिला कलेक्टर तैनात हैं, उनमें खरगोन में भव्या मित्तल, बड़वानी में जयति सिंह, अलीराजपुर में नेहा माथुर, रतलाम में मिशा सिंह, शाजापुर में ऋतु बाफना, आगर मालवा में प्रीति यादव, मंदसौर में अदिति गर्ग, ग्वालियर में रुचिका चौहान, श्योपुर में शीला दाहिमा, मैहर में विदिशा मुखर्जी, उमरिया में राखी सहाय, सागर में प्रतिमा पाल, पन्ना में उमा परमार, निवाड़ी में जमुना भिड़े, नरसिंहपुर में रजनी सिंह, सिवनी में नेहा मीना और डिंडौरी में अंजू पवन भदौरिया शामिल हैं।
यह नाम केवल आंकड़ों का विवरण नहीं है, बल्कि यह मुख्यमंत्री डॉ.मोहन यादव की उस सोच का प्रतिबिंब है जिसमें महिलाओं को निर्णय लेने की जिम्मेदारी दी जा रही है। कलेक्टर का पद केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि जिले के समग्र विकास, कानून-व्यवस्था और शासन की योजनाओं के क्रियान्वयन का केंद्र होता है। ऐसे में इतनी बड़ी संख्या में महिला कलेक्टरों की नियुक्ति यह दर्शाती है कि सरकार ने नेतृत्व के स्तर पर महिलाओं को बराबरी का अवसर दिया है।

पुलिस महकमे में भी महिलाओं की बढ़ती पकड़

प्रशासन के साथ-साथ पुलिस व्यवस्था में भी महिलाओं की भागीदारी तेजी से बढ़ी है। वर्तमान में चार जिलों में पुलिस अधीक्षक के रूप में महिला अफसर तैनात हैं, जो सीधे तौर पर कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी संभाल रही हैं। इसके अलावा एक रेंज की कमान महिला आईजी के पास है।
शहडोल रेंज की आईजी चैत्रा एन हैं, जबकि सविता सोहने डीआईजी के रूप में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभा रही हैं। राजधानी भोपाल में मोनिका शुक्ला अतिरिक्त पुलिस आयुक्त के पद पर कार्यरत हैं। अब महिला पुलिस अधिकारियों को पुलिस मुख्यालय ही नहीं,बड़े और जटिल शहरी प्रशासन में भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दी जा रही है। मैदानी स्तर पर महिला आईपीएस अधिकारियों की उपस्थिति उल्लेखनीय है। यांगचेन डोलकर (इंदौर ग्रामीण), हितिका वासल (गुना), निवेदिता नायडू (पन्ना) और वाहिनी सिंह (डिंडौरी) जैसे अधिकारी एसपी के रूप में कार्य कर रहे हैं। वहीं श्रद्धा तिवारी और सोनाक्षी सक्सेना भोपाल में डीसीपी( उपायुक्त) के रूप में सक्रिय हैं। यह पहली बार है जब प्रदेश में इतनी बड़ी संख्या में महिला आईपीएस अधिकारियों को फील्ड पोस्टिंग दी गई है।

महिला अधिकारियों की मैदानी पोस्टिंग: प्रतीक नहीं, वास्तविक सशक्तिकरण

अक्सर महिला सशक्तिकरण की बात नीतियों और घोषणाओं तक सीमित रह जाती है, लेकिन मध्यप्रदेश में जो बदलाव देखने को मिल रहा है, वह इससे आगे का है। यहां महिलाओं को केवल पद नहीं दिए गए, बल्कि उन्हें मैदानी जिम्मेदारियां सौंपी गई हैं। जहां निर्णय लेने होते हैं, संकट से निपटना होता है और जनता से सीधा संवाद करना होता है।
मैदानी पोस्टिंग का मतलब है कि अधिकारी सीधे जनता के संपर्क में रहते हैं। यहां संवेदनशीलता, त्वरित निर्णय क्षमता और नेतृत्व कौशल की सबसे अधिक जरूरत होती है। महिला अधिकारियों की बढ़ती तैनाती से यह भी स्पष्ट होता है कि सरकार उनके नेतृत्व पर पूरी तरह भरोसा कर रही है।

मुख्यमंत्री की नीति: भरोसा और अवसर

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की कार्यशैली में महिला अधिकारियों को लेकर एक स्पष्ट नीति दिखाई देती है वह है भरोसा और अवसर। यह केवल एक-दो नियुक्तियों तक सीमित नहीं है, बल्कि व्यापक स्तर पर महिलाओं को जिम्मेदारी देने की सोच के रूप में सामने आया है। उनका यह दृष्टिकोण यह संकेत देता है कि प्रशासन में विविधता को महत्व दिया जा रहा है। जब निर्णय लेने वाले पदों पर महिलाएं होती हैं, तो नीतियों और उनके क्रियान्वयन में संतुलन और संवेदनशीलता दोनों बढ़ते हैं। यह बात कई प्रशासनिक अध्ययनों में भी सामने आई है कि विविध नेतृत्व बेहतर परिणाम देता है।
महिला आरक्षण की बहस और मध्यप्रदेश का उदाहरण
जब देश में महिला आरक्षण को लेकर बहस तेज होती है, तो अक्सर यह सवाल उठता है कि क्या महिलाएं नेतृत्व की बड़ी जिम्मेदारियां संभालने के लिए सक्षम हैं और क्या इसके लिए उन्हें पर्याप्त अवसर मिल रहे हैं। मध्यप्रदेश इस सवाल का सबसे सटीक उत्तर और उदाहरण प्रस्तुत कर रहा है। यहां महिलाओं को न केवल अवसर दिए गए हैं, बल्कि उन्हें जिम्मेदारी भी सौंपी गई है और वे उसे निभा भी रही हैं। ऐसे में जब मुख्यमंत्री यह कहते हैं कि महिलाओं को राजनीतिक प्रतिनिधित्व में भी समान अवसर मिलना चाहिए, केवल एक राजनीतिक बयान नहीं रह जाता, बल्कि एक स्थापित उदाहरण के आधार पर दिया गया तर्क बन जाता है।
विपक्ष पर आक्रामक रुख का आधार
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव जब महिला आरक्षण के मुद्दे पर विपक्ष पर हमला बोल रहे हैं, तो उनके पास अपने फैसलों का ठोस आधार है। वे यह दिखा सकते हैं कि राज्य स्तर पर उन्होंने महिलाओं को नेतृत्व में आगे बढ़ाया है। इसलिए वे आत्मविश्वास और अधिकार के साथ यह सवाल उठा सकते हैं कि जब प्रशासनिक स्तर पर यह संभव है, तो राजनीतिक स्तर पर इसे लागू करने में देरी क्यों हो रही है।
सामाजिक प्रभाव: बदलती सोच
इस बदलाव का असर केवल प्रशासनिक ढांचे तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज पर भी पड़ रहा है। जब किसी जिले की कलेक्टर या एसपी एक महिला होती है, तो यह समाज में एक मजबूत संदेश देता है। इससे लड़कियों और महिलाओं में आत्मविश्वास बढ़ता है और वे भी बड़े पदों के लिए खुद को तैयार करने लगती हैं।
यह बदलाव धीरे-धीरे उस सामाजिक सोच को भी बदल रहा है, जिसमें महिलाओं को सीमित भूमिकाओं में देखा जाता था। अब वे निर्णय लेने वाली कुर्सियों पर बैठकर नीतियां तय कर रही हैं और उन्हें लागू भी कर रही हैं।

महिला सशक्तिकरण के मॉडल के रूप में उभरता मध्यप्रदेश

मध्यप्रदेश में महिला अधिकारियों की बढ़ती भागीदारी और उन्हें मैदानी जिम्मेदारियां सौंपने का निर्णय एक व्यापक बदलाव का संकेत है। यह केवल प्रशासनिक सुधार नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन की दिशा में भी एक बड़ा कदम है।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के ये कदम साबित कर रहे हैं कि अगर राजनीतिक इच्छाशक्ति हो, तो महिला सशक्तिकरण को जमीन पर उतारा जा सकता है। महिला आरक्षण की राष्ट्रीय बहस के बीच मध्यप्रदेश का यह मॉडल एक उदाहरण के रूप में सामने आ रहा है, जहां महिलाओं को केवल अधिकार की बात नहीं, बल्कि जिम्मेदारी भी दी जा रही है। स्पष्ट है कि यह बदलाव आने वाले समय में और गहराएगा और मध्यप्रदेश महिला नेतृत्व के मामले में देश के लिए एक नई दिशा तय कर सकता है। (विनायक फीचर्स)

धोखाधड़ी: कुबेरपुर में भू-माफिया का बड़ा खेल, राजस्व रिकॉर्ड में नाम नहीं फिर भी बेच डाली जमीन

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– वक्फ और शत्रु संपत्ति को खुर्द-बुर्द करने की साजिश का पर्दाफाश
– पाकिस्तान जा चुके वारिसों की जमीन का हुआ अवैध सौदा

मोहम्मद आकिब खाँन
यूथ इंडिया फर्रुखाबाद: जिले की कायमगंज तहसील क्षेत्र के ग्राम कुबेरपुर में सरकारी नियमों और राजस्व अभिलेखों को ताक पर रखकर ‘शत्रु संपत्ति’ और ‘वक्फ’ की श्रेणी में आने वाली कीमती जमीन को अवैध रूप से बेचने का मामला प्रकाश में आया है। आरोप है कि राजस्व रिकॉर्ड में नाम दर्ज न होने के बावजूद एक व्यक्ति ने स्वयं को भूस्वामी दर्शाकर स्टाम्प पेपर के माध्यम से भूमि का विक्रय कर दिया।

ये है पूरा मामला
ग्राम कुबेरपुर की गाटा संख्या 170 स्थित भूखंड के मूल खातेदार फरजंद अली खां पुत्र विलायत अली खां थे। उनके विधिक वारिस अफ़सर अली खां और सरवर अली खां दशकों पहले भारत छोड़कर पाकिस्तान जा चुके हैं और वहां की नागरिकता ग्रहण कर चुके हैं। नियमानुसार, भारत छोड़कर पाकिस्तान जाने वाले व्यक्तियों की संपत्ति ‘शत्रु संपत्ति अधिनियम’ के दायरे में आती है। साथ ही यह भूमि वक्फ अभिलेखों में भी दर्ज बताई जा रही है।
आरोप है कि शफ़क़त अली खां उर्फ मियांलाल पुत्र हामिद अली खां जो मूल रूप से सिकंदरपुर महमूद (थाना शमशाबाद) के निवासी हैं और वर्तमान में कुबेरपुर में रह रहे हैं, का नाम इस भूमि की खतौनी में कहीं भी दर्ज नहीं है। इसके बावजूद उन्होंने धड़ल्ले से खुद को मालिक बताते हुए स्टाम्प पेपर के जरिए इस विवादित भूमि का सौदा कर दिया।

स्थानीय लोगों ने प्रशासन से मांग की है कि इस अवैध सौदे को तत्काल शून्य घोषित किया जाए और आरोपी के विरुद्ध सुसंगत धाराओं में मुकदमा दर्ज कर कठोर कार्रवाई की जाए। शत्रु संपत्ति और वक्फ बोर्ड की जमीन होने के कारण इस भूखंड की सुरक्षा की जिम्मेदारी प्रशासन की है। बिना किसी वैध मालिकाना हक के स्टाम्प पर किए गए इस विक्रय ने तहसील प्रशासन की सतर्कता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

राजपुर बांगर में रास्ते के विवाद से हिंसक झड़प, एक घायल आगरा रेफर

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मथुरा
थाना जैत क्षेत्र के गांव राजपुर बांगर में सोमवार रात रास्ते के विवाद ने अचानक गंभीर रूप ले लिया। मामूली कहासुनी से शुरू हुआ यह विवाद देखते ही देखते दो पक्षों के बीच हिंसक झड़प में बदल गया, जिससे पूरे गांव में अफरा-तफरी मच गई और लोग अपने घरों में छिपने को मजबूर हो गए।

जानकारी के अनुसार, रात करीब 10:30 बजे गांव के मनीष और राहुल स्कूटी से घर लौट रहे थे, तभी सामने से दीपक अपनी कार लेकर आ गया। रास्ता निकालने को लेकर दोनों पक्षों में कहासुनी शुरू हुई, जो जल्द ही बढ़कर मारपीट में बदल गई। इसके बाद दोनों पक्षों के लोग लाठी-डंडों के साथ मौके पर पहुंच गए और एक-दूसरे पर हमला कर दिया।

झड़प के दौरान जमकर पथराव हुआ और स्थिति बेहद तनावपूर्ण हो गई। स्थानीय लोगों का कहना है कि इस दौरान कई राउंड फायरिंग जैसी आवाजें भी सुनाई दीं, जिससे दहशत और बढ़ गई। हालांकि पुलिस ने फायरिंग की पुष्टि से इनकार किया है और इसे भ्रम बताया है।

घटना में एक पक्ष के राहुल के सिर में गंभीर चोट आई, जिन्हें पहले वृंदावन के सौ-शैय्या अस्पताल ले जाया गया और बाद में हालत गंभीर होने पर आगरा रेफर कर दिया गया। मनीष को भी चोटें आई हैं, जबकि दूसरे पक्ष के राजेश सैनी घायल हुए हैं, जिनका मेडिकल परीक्षण कराया गया है।

सूचना मिलते ही थाना जैत पुलिस भारी बल के साथ मौके पर पहुंची और स्थिति को नियंत्रित किया। पुलिस ने गांव में शांति व्यवस्था बहाल कर दी है और हालात पर लगातार नजर रखी जा रही है।

थाना प्रभारी उमेश चंद्र त्रिपाठी ने बताया कि फायरिंग की बात सही नहीं है और पास के एक शादी समारोह में चल रहे पटाखों की आवाज को लोगों ने गोली चलने की आवाज समझ लिया। पुलिस मामले की जांच कर रही है और सीसीटीवी फुटेज के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी।

सिविल बार के चैंबरों में भीषण आग, पांच चैंबर जलकर राख

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बदायूं
मंगलवार सुबह कलक्ट्रेट रोड स्थित सिविल बार के सामने उस समय अफरा-तफरी मच गई जब अधिवक्ताओं के चैंबरों में अचानक आग लग गई। आग इतनी तेजी से फैली कि कुछ ही मिनटों में उसने विकराल रूप ले लिया और पूरे इलाके में धुआं और आग की लपटें दिखाई देने लगीं।

प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, आग लगते ही आसपास मौजूद लोग घबरा गए और तुरंत पुलिस व दमकल विभाग को सूचना दी गई। घटना कोतवाली सिविल लाइंस क्षेत्र की बताई जा रही है। सूचना मिलते ही फायर ब्रिगेड की गाड़ियां मौके पर पहुंचीं और आग बुझाने का प्रयास शुरू किया गया।

दमकल कर्मियों को आग पर काबू पाने में काफी मशक्कत करनी पड़ी। कई घंटों की कड़ी कोशिशों के बाद आग को नियंत्रित किया जा सका, लेकिन तब तक पांच चैंबर पूरी तरह जलकर राख हो चुके थे। आग में रखे गए महत्वपूर्ण दस्तावेज, केस फाइलें, फर्नीचर और अन्य जरूरी सामान भी नष्ट हो गया।

घटना के बाद मौके पर बड़ी संख्या में अधिवक्ता पहुंच गए। अपने चैंबरों और केस फाइलों को जलता देख वकीलों में गहरा आक्रोश और निराशा देखने को मिली। अधिवक्ताओं का कहना है कि इस नुकसान से कई मामलों की कानूनी प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।

फिलहाल आग लगने के कारणों का स्पष्ट पता नहीं चल सका है। प्रारंभिक तौर पर शॉर्ट सर्किट की आशंका जताई जा रही है, लेकिन पुलिस अन्य संभावित कारणों की भी जांच कर रही है। प्रशासन ने मामले की जांच के आदेश दे दिए हैं।

इसी बीच शहर में एक और घटना भी सामने आई, जहां स्टेशन रोड पर एक पुराना पेड़ अचानक गिर गया। इस घटना में दो गाड़ियां क्षतिग्रस्त हो गईं और बिजली लाइन टूटने से इलाके में कुछ समय के लिए बिजली आपूर्ति बाधित रही। हालांकि गनीमत रही कि उस समय कोई व्यक्ति वहां मौजूद नहीं था, जिससे बड़ा हादसा टल गया।

नगर पालिका और बिजली विभाग की टीमों ने मौके पर पहुंचकर स्थिति को संभाला और सड़क से पेड़ हटाकर यातायात बहाल किया। दोनों घटनाओं के बाद शहर में सतर्कता बढ़ा दी गई है।