40 C
Lucknow
Tuesday, April 21, 2026

मैदान में महिला अफसर, सियासत में आक्रामक मोहन यादव

Must read

 

(पवन वर्मा -विनायक फीचर्स)
देश की राजनीति में महिलाओं को लोकसभा और विधानसभा में 33 प्रतिशत आरक्षण देने का मुद्दा गर्म है। संसद से लेकर सियासी मंचों तक इस पर तीखी बहस हो रही है। आरोप-प्रत्यारोप का दौर भी तेज है और हर दल अपने-अपने तरीके से इस मुद्दे को परिभाषित करने में जुटा है। ऐसे समय में मध्यप्रदेश की तस्वीर एक अलग ही रूप में सामने आयी है, जहां मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने महिला नेतृत्व को केवल राजनीतिक वादों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था के केंद्र में ला दिया है।
महिला आरक्षण का मुद्दा भले ही आज राष्ट्रीय राजनीति में गर्माया हो, लेकिन मध्यप्रदेश में इसके संकेत पहले ही दिखाई देने लगे थे। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने अपने कार्यकाल में महिला आईएएस और आईपीएस अधिकारियों पर जो भरोसा जताया है, वह पूर्ववर्ती सरकारों के मुखियाओं की तुलना में कहीं अधिक व्यापक और स्पष्ट नजर आता है। यही वजह है कि जब वे महिला आरक्षण से जुड़े विधेयक को लेकर विपक्ष पर हमलावर होते हैं, तो उनके तर्क केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि जमीन पर लिए गए फैसलों से भरेपूरे होते हैं।

सत्रह जिलों में महिला कलेक्टर: प्रशासन में महिलाओं की प्रभावी उपस्थिति

मध्यप्रदेश में इस समय 55 जिलों में से 17 जिलों की कमान महिला कलेक्टरों के हाथ में है। यह आंकड़ा अपने आप में यह बता रहा है कि मध्यप्रदेश के प्रशासनिक ढांचे में महिलाओं की भूमिका किस तेजी से बढ़ी है। जिन जिलों में महिला कलेक्टर तैनात हैं, उनमें खरगोन में भव्या मित्तल, बड़वानी में जयति सिंह, अलीराजपुर में नेहा माथुर, रतलाम में मिशा सिंह, शाजापुर में ऋतु बाफना, आगर मालवा में प्रीति यादव, मंदसौर में अदिति गर्ग, ग्वालियर में रुचिका चौहान, श्योपुर में शीला दाहिमा, मैहर में विदिशा मुखर्जी, उमरिया में राखी सहाय, सागर में प्रतिमा पाल, पन्ना में उमा परमार, निवाड़ी में जमुना भिड़े, नरसिंहपुर में रजनी सिंह, सिवनी में नेहा मीना और डिंडौरी में अंजू पवन भदौरिया शामिल हैं।
यह नाम केवल आंकड़ों का विवरण नहीं है, बल्कि यह मुख्यमंत्री डॉ.मोहन यादव की उस सोच का प्रतिबिंब है जिसमें महिलाओं को निर्णय लेने की जिम्मेदारी दी जा रही है। कलेक्टर का पद केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि जिले के समग्र विकास, कानून-व्यवस्था और शासन की योजनाओं के क्रियान्वयन का केंद्र होता है। ऐसे में इतनी बड़ी संख्या में महिला कलेक्टरों की नियुक्ति यह दर्शाती है कि सरकार ने नेतृत्व के स्तर पर महिलाओं को बराबरी का अवसर दिया है।

पुलिस महकमे में भी महिलाओं की बढ़ती पकड़

प्रशासन के साथ-साथ पुलिस व्यवस्था में भी महिलाओं की भागीदारी तेजी से बढ़ी है। वर्तमान में चार जिलों में पुलिस अधीक्षक के रूप में महिला अफसर तैनात हैं, जो सीधे तौर पर कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी संभाल रही हैं। इसके अलावा एक रेंज की कमान महिला आईजी के पास है।
शहडोल रेंज की आईजी चैत्रा एन हैं, जबकि सविता सोहने डीआईजी के रूप में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभा रही हैं। राजधानी भोपाल में मोनिका शुक्ला अतिरिक्त पुलिस आयुक्त के पद पर कार्यरत हैं। अब महिला पुलिस अधिकारियों को पुलिस मुख्यालय ही नहीं,बड़े और जटिल शहरी प्रशासन में भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दी जा रही है। मैदानी स्तर पर महिला आईपीएस अधिकारियों की उपस्थिति उल्लेखनीय है। यांगचेन डोलकर (इंदौर ग्रामीण), हितिका वासल (गुना), निवेदिता नायडू (पन्ना) और वाहिनी सिंह (डिंडौरी) जैसे अधिकारी एसपी के रूप में कार्य कर रहे हैं। वहीं श्रद्धा तिवारी और सोनाक्षी सक्सेना भोपाल में डीसीपी( उपायुक्त) के रूप में सक्रिय हैं। यह पहली बार है जब प्रदेश में इतनी बड़ी संख्या में महिला आईपीएस अधिकारियों को फील्ड पोस्टिंग दी गई है।

महिला अधिकारियों की मैदानी पोस्टिंग: प्रतीक नहीं, वास्तविक सशक्तिकरण

अक्सर महिला सशक्तिकरण की बात नीतियों और घोषणाओं तक सीमित रह जाती है, लेकिन मध्यप्रदेश में जो बदलाव देखने को मिल रहा है, वह इससे आगे का है। यहां महिलाओं को केवल पद नहीं दिए गए, बल्कि उन्हें मैदानी जिम्मेदारियां सौंपी गई हैं। जहां निर्णय लेने होते हैं, संकट से निपटना होता है और जनता से सीधा संवाद करना होता है।
मैदानी पोस्टिंग का मतलब है कि अधिकारी सीधे जनता के संपर्क में रहते हैं। यहां संवेदनशीलता, त्वरित निर्णय क्षमता और नेतृत्व कौशल की सबसे अधिक जरूरत होती है। महिला अधिकारियों की बढ़ती तैनाती से यह भी स्पष्ट होता है कि सरकार उनके नेतृत्व पर पूरी तरह भरोसा कर रही है।

मुख्यमंत्री की नीति: भरोसा और अवसर

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की कार्यशैली में महिला अधिकारियों को लेकर एक स्पष्ट नीति दिखाई देती है वह है भरोसा और अवसर। यह केवल एक-दो नियुक्तियों तक सीमित नहीं है, बल्कि व्यापक स्तर पर महिलाओं को जिम्मेदारी देने की सोच के रूप में सामने आया है। उनका यह दृष्टिकोण यह संकेत देता है कि प्रशासन में विविधता को महत्व दिया जा रहा है। जब निर्णय लेने वाले पदों पर महिलाएं होती हैं, तो नीतियों और उनके क्रियान्वयन में संतुलन और संवेदनशीलता दोनों बढ़ते हैं। यह बात कई प्रशासनिक अध्ययनों में भी सामने आई है कि विविध नेतृत्व बेहतर परिणाम देता है।
महिला आरक्षण की बहस और मध्यप्रदेश का उदाहरण
जब देश में महिला आरक्षण को लेकर बहस तेज होती है, तो अक्सर यह सवाल उठता है कि क्या महिलाएं नेतृत्व की बड़ी जिम्मेदारियां संभालने के लिए सक्षम हैं और क्या इसके लिए उन्हें पर्याप्त अवसर मिल रहे हैं। मध्यप्रदेश इस सवाल का सबसे सटीक उत्तर और उदाहरण प्रस्तुत कर रहा है। यहां महिलाओं को न केवल अवसर दिए गए हैं, बल्कि उन्हें जिम्मेदारी भी सौंपी गई है और वे उसे निभा भी रही हैं। ऐसे में जब मुख्यमंत्री यह कहते हैं कि महिलाओं को राजनीतिक प्रतिनिधित्व में भी समान अवसर मिलना चाहिए, केवल एक राजनीतिक बयान नहीं रह जाता, बल्कि एक स्थापित उदाहरण के आधार पर दिया गया तर्क बन जाता है।
विपक्ष पर आक्रामक रुख का आधार
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव जब महिला आरक्षण के मुद्दे पर विपक्ष पर हमला बोल रहे हैं, तो उनके पास अपने फैसलों का ठोस आधार है। वे यह दिखा सकते हैं कि राज्य स्तर पर उन्होंने महिलाओं को नेतृत्व में आगे बढ़ाया है। इसलिए वे आत्मविश्वास और अधिकार के साथ यह सवाल उठा सकते हैं कि जब प्रशासनिक स्तर पर यह संभव है, तो राजनीतिक स्तर पर इसे लागू करने में देरी क्यों हो रही है।
सामाजिक प्रभाव: बदलती सोच
इस बदलाव का असर केवल प्रशासनिक ढांचे तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज पर भी पड़ रहा है। जब किसी जिले की कलेक्टर या एसपी एक महिला होती है, तो यह समाज में एक मजबूत संदेश देता है। इससे लड़कियों और महिलाओं में आत्मविश्वास बढ़ता है और वे भी बड़े पदों के लिए खुद को तैयार करने लगती हैं।
यह बदलाव धीरे-धीरे उस सामाजिक सोच को भी बदल रहा है, जिसमें महिलाओं को सीमित भूमिकाओं में देखा जाता था। अब वे निर्णय लेने वाली कुर्सियों पर बैठकर नीतियां तय कर रही हैं और उन्हें लागू भी कर रही हैं।

महिला सशक्तिकरण के मॉडल के रूप में उभरता मध्यप्रदेश

मध्यप्रदेश में महिला अधिकारियों की बढ़ती भागीदारी और उन्हें मैदानी जिम्मेदारियां सौंपने का निर्णय एक व्यापक बदलाव का संकेत है। यह केवल प्रशासनिक सुधार नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन की दिशा में भी एक बड़ा कदम है।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के ये कदम साबित कर रहे हैं कि अगर राजनीतिक इच्छाशक्ति हो, तो महिला सशक्तिकरण को जमीन पर उतारा जा सकता है। महिला आरक्षण की राष्ट्रीय बहस के बीच मध्यप्रदेश का यह मॉडल एक उदाहरण के रूप में सामने आ रहा है, जहां महिलाओं को केवल अधिकार की बात नहीं, बल्कि जिम्मेदारी भी दी जा रही है। स्पष्ट है कि यह बदलाव आने वाले समय में और गहराएगा और मध्यप्रदेश महिला नेतृत्व के मामले में देश के लिए एक नई दिशा तय कर सकता है। (विनायक फीचर्स)

Must read

More articles

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Latest article