– स्वतः संज्ञान लेकर दिए व्यापक जांच के आदेश
– प्रदेश के 4,157 अधिवक्ताओं पर 5,056 आपराधिक मुकदमे दर्ज
– 105 कथित फर्जी डिग्रीधारक अधिवक्ताओं पर एफआईआर कराने का निर्देश
प्रयागराज/लखनऊ। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश में अधिवक्ताओं की आपराधिक पृष्ठभूमि और कथित फर्जी डिग्री के मामलों को गंभीरता से लेते हुए स्वतः संज्ञान लिया है। न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर की एकलपीठ ने मामले में विस्तृत जांच के निर्देश देते हुए पुलिस महानिदेशक, अभियोजन निदेशालय और उत्तर प्रदेश बार काउंसिल से प्राप्त रिपोर्टों के आधार पर कड़ी टिप्पणी की है।
न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश में 5,14,439 सक्रिय पंजीकृत अधिवक्ताओं में से 4,157 अधिवक्ताओं के विरुद्ध 5,056 आपराधिक मुकदमे दर्ज हैं। इनमें 418 अधिवक्ताओं पर तीन या उससे अधिक आपराधिक मामले लंबित हैं, जबकि 28 अधिवक्ताओं के विरुद्ध 11 से अधिक प्रथम सूचना रिपोर्ट (एफआईआर) दर्ज होने की जानकारी सामने आई है। रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया कि एक अधिवक्ता के विरुद्ध अकेले 46 एफआईआर दर्ज हैं।
राजधानी लखनऊ के आंकड़े भी चिंताजनक बताए गए हैं। रिपोर्ट के अनुसार यहां 905 अधिवक्ताओं के विरुद्ध 575 आपराधिक मुकदमे दर्ज हैं। इनमें वजीरगंज थाना क्षेत्र सबसे अधिक चर्चा में है, जहां 422 अधिवक्ताओं के विरुद्ध 236 आपराधिक मामले दर्ज पाए गए हैं।
उच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश बार काउंसिल के सचिव को निर्देश दिया है कि 105 कथित फर्जी डिग्रीधारक अधिवक्ताओं के विरुद्ध धोखाधड़ी, जालसाजी और अन्य प्रासंगिक धाराओं में तत्काल एफआईआर दर्ज कराई जाए। साथ ही राज्य प्रशासन और संबंधित अधिकारियों से अब तक की गई कार्रवाई की विस्तृत रिपोर्ट भी तलब की है।
मामले की अगली सुनवाई 20 अगस्त को निर्धारित की गई है। इस दौरान न्यायालय जांच की प्रगति और प्रशासन द्वारा उठाए गए कदमों की समीक्षा करेगा। यह मामला प्रदेश की न्यायिक व्यवस्था और अधिवक्ता पंजीकरण प्रक्रिया की पारदर्शिता के दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।


