(पवन वर्मा-विनायक फीचर्स)
प्रदेश में 1 से 16 जून तक जिस गति से अधिकारियों और कर्मचारियों के तबादले राज्य स्तर से लेकर जिला स्तर तक हुए हैं, उनकी संख्या सुनकर हर कोई चौंक जा रहा है। एक अनुमान के तहत यह माना जा रहा है कि इन 16 दिनों में सरकार ने 17 हजार से अधिक तबादले कर दिए और अब कांग्रेस ने इसे तबादला उद्योग का नाम दिया है। इससे पहले मध्य प्रदेश में कांग्रेस जब तक सत्ता में रही तब-तब प्रदेश में तबादलों को एक उद्योग के रूप में माना जाता था। भाजपा ने ही कांग्रेस की सरकार में तबादलों में हुए भ्रष्टाचार के चलते इसे तबादला उद्योग का नाम दिया था। अभी तक भाजपा सरकार पर तबादलों के नाम पर उद्योग चलाने के आरोप नहीं लगे थे, लेकिन इस बार डॉ. मोहन यादव की सरकार इस मामले में विपक्ष के निशाने पर आ गई है।
कर्मचारियों और अधिकारियों का स्थानांतरण एक आवश्यक एवं अनिवार्य प्रशासनिक प्रक्रिया है। हर वर्ष मई-जून में आवश्यक स्थानांतरण किए जाते हैं। इस वर्ष डॉ. मोहन यादव सरकार के सामने चुनौती केवल तबादले करने की नहीं थी, बल्कि यह संदेश देने की भी थी कि पूरी प्रक्रिया निष्पक्ष और आवश्यकता आधारित है। लेकिन जिस तरह तबादलों के दौरान भाजपा के नेताओं ने सक्रियता दिखाई , उसने विपक्ष को सरकार पर हमला करने का पर्याप्त अवसर दे दिया। इससे पहले अर्जुन सिंह, मोतीलाल वोरा, दिग्विजय सिंह और कमलनाथ की सरकारों में भी तबादला उद्योग चलाए जाने के आरोप लगते रहे हैं,और अब भाजपा की डॉ. मोहन यादव की सरकार पर भी यह आरोप लग रहे हैं।
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने आरोप लगाया है कि राज्य में हुए लगभग 20 हजार कर्मचारियों और अधिकारियों के तबादलों में 200 करोड़ रुपये का लेन-देन हुआ है। यह आरोप कितना सही है और कितना राजनीतिक, यह अलग विषय है, लेकिन इतना जरूर है कि तबादलों पर से प्रतिबंध हटने के बाद जो तस्वीर सामने आई, उसने इस बहस को फिर से जिंदा कर दिया है।
मध्य प्रदेश में 1 जून से 15 जून तक तबादलों पर लगा प्रतिबंध हटाया गया था। बाद में सरकार ने इसे एक दिन और बढ़ाकर 16 जून की मध्यरात्रि तक कर दिया। इन 16 दिनों में विभिन्न विभागों में बड़ी संख्या में तबादले हुए। राज्य से लेकर जिलों तक हजारों कर्मचारी और अधिकारी प्रभावित हुए। तबादलों का दौर शुरू होते ही मंत्रियों के आवासों की रौनक बढ़ गई। मंत्रालय में नेताओं की आवाजाही बढ़ गई। विधायक, सांसद, संगठन पदाधिकारी और स्थानीय नेता भोपाल पहुंचने लगे। कई मंत्रियों के आवास पर सुबह से रात तक लोगों की भीड़ दिखाई दी। ऐसा लग रहा था मानो सरकार का सबसे महत्वपूर्ण काम इन दिनों तबादले ही हों।
यहीं से कई सवाल भी खड़े होते हैं। प्रतिबंध हटते ही सत्ता के केंद्रों पर इतनी असामान्य हलचल क्यों दिखाई दी? जो प्रक्रिया सरकार ने बनाई थी, उस प्रक्रिया से ही तबादले हो रहे थे तो मंत्रियों के आवास और मंत्रालय में तबादलों की सिफारिश करने वालों की भीड़ क्यों बड़ी। आखिर ऐसी क्या जरूरत आ गई थी कि लगभग हर विभाग में बड़ी संख्या में स्थानांतरण करने पड़े? विपक्ष इन्हीं सवालों को आधार बनाकर सरकार को घेर रहा है।
राजनीति में यह कोई नई बात नहीं है। हर जनप्रतिनिधि चाहता है कि उसके क्षेत्र में ऐसे अधिकारी, कर्मचारी रहें जिनसे उसका तालमेल बेहतर हो। विधायक और सांसद अपने क्षेत्रों के हिसाब से अधिकारियों की पदस्थापना को महत्वपूर्ण मानते हैं। यही वजह है कि जब भी तबादलों पर से प्रतिबंध हटता है, तब नेताओं की सक्रियता अचानक बढ़ जाती है। इस बार भी वही हुआ।
तबादलों के दौरान सबसे ज्यादा दबाव मंत्रियों पर दिखाई दिया। संगठन के नेता, जनप्रतिनिधि और विभिन्न स्तर के प्रभावशाली लोग अपनी-अपनी सिफारिशों के साथ सक्रिय रहे। कई नेताओं की बात मानी गई तो कई की नहीं। परिणाम यह हुआ कि तबादलों का दौर समाप्त होने के बाद सत्ता पक्ष के भीतर ही असंतोष की चर्चाएं शुरू हो गई। कई विधायक और नेता अपनी अपेक्षाओं के अनुरूप तबादले नहीं होने से नाराज बताए जा रहे हैं।
यह भी कम दिलचस्प नहीं है कि तबादलों पर से प्रतिबंध हटने के दौरान भाजपा संगठन और जनप्रतिनिधियों की सक्रियता जिस स्तर पर दिखाई दी, वैसी सक्रियता सामान्य प्रशासनिक मुद्दों पर कम ही देखने को मिलती है। यही कारण है कि तबादलों को लेकर हमेशा यह धारणा बनती रही है कि यह केवल सरकारी प्रक्रिया नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रभाव का भी एक बड़ा माध्यम है। कई जनप्रतिनिधि अपने समर्थकों और कार्यकर्ताओं के सामने अपनी राजनीतिक ताकत भी इसी आधार पर साबित करने की कोशिश करते हैं कि उनकी सिफारिश पर कौन अधिकारी कहां पदस्थ हुआ। मध्य प्रदेश में तबादले हमेशा से केवल प्रशासनिक विषय नहीं रहे हैं। वे राजनीतिक शक्ति के प्रदर्शन का माध्यम भी बनते रहे हैं। कौन अधिकारी किस जिले में जाएगा, जिस अफसर से नेता नाराज है उसे हटाने के लिए पूरा जोर लगाया जाएगा। और कौन रहेगा, इसे लेकर राजनीतिक रुचि हमेशा बनी रहती है। यही कारण है कि तबादलों का छोटा सा दौर भी पूरे राजनीतिक वातावरण को प्रभावित कर देता है।
दिलचस्प बात यह है कि जिन आरोपों को लेकर भाजपा वर्षों तक कांग्रेस सरकारों को घेरती रही,आज लगभग वही आरोप भाजपा सरकार के सामने खड़े हैं। कांग्रेस के शासनकाल में भाजपा तबादलों में भ्रष्टाचार, दबाव और प्रभाव की राजनीति का आरोप लगाती थी। उस समय भाजपा नेताओं का तर्क होता था कि तबादलों को कमाई और राजनीतिक प्रबंधन का साधन बना दिया गया है। आज कांग्रेस उसी तर्क के साथ भाजपा सरकार को घेर रही है। राजनीति का यह भी एक दिलचस्प पक्ष है कि विपक्ष में रहते हुए जो व्यवस्था गलत दिखाई देती है, सत्ता में आने के बाद वही व्यवस्था प्रशासनिक आवश्यकता लगने लगती है। यही वजह है कि तबादलों को लेकर राजनीतिक दलों के बयान समय के साथ बदल जाते हैं, लेकिन आरोप लगभग वही बने रहते हैं। इस बार भी कुछ ऐसा ही देखने को मिल रहा है।
इन सबके बीच एक बड़ा सवाल यह भी है कि क्या हजारों तबादलों के बाद प्रशासनिक व्यवस्था में कोई बड़ा बदलाव दिखाई देगा? क्या जिन उद्देश्यों को ध्यान में रखकर यह प्रक्रिया शुरू की गई थी, वे पूरे हो सकेंगे? या फिर कुछ महीनों बाद फिर नए तबादलों और नई सिफारिशों का दौर शुरू होगा? ऐसे सवाल इसलिए भी उठते हैं क्योंकि प्रदेश में तबादलों को लेकर बहस कभी केवल प्रशासनिक नहीं रही, बल्कि हमेशा राजनीतिक चश्मे से भी देखी जाती रही है।
अब तबादलों पर फिर प्रतिबंध लग चुका है। मंत्रालय के गलियारे सामान्य हो रहे हैं। मंत्री आवासों पर भीड़ कम हो गई है। लेकिन राजनीतिक बहस अभी भी जारी है। कांग्रेस तबादला उद्योग का मुद्दा उठाए हुए है और आगे चलकर यहा मुद्दा 20 से 24 जुलाई तक होने वाले विधानसभा के सत्र में भी सुनाई दे सकता है। फिलहाल इतना तय है कि मध्य प्रदेश में तबादलों का दौर भले खत्म हो गया हो, लेकिन तबादला उद्योग की चर्चा एक बार फिर लौट आई है। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार कठघरे में कांग्रेस नहीं, बल्कि भाजपा सरकार खड़ी दिखाई दे रही है। (विनायक फीचर्स)


