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Thursday, August 6, 2026

नई पीढ़ी हमारी पीढ़ी से अधिक ईमानदार और देशभक्त : मोहन भागवत

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समय रहते संवाद होता तो आंदोलन की नौबत नहीं आती

मुंबई। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने गुरुवार को मुंबई में आयोजित छात्र संवाद कार्यक्रम में देशभर से आए लगभग दो हजार विद्यार्थियों से खुलकर बातचीत की। उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी हमारी पीढ़ी से अधिक ईमानदार, अधिक जागरूक और अधिक देशभक्त है। यदि समय रहते युवाओं से संवाद किया जाता, तो कई आंदोलनों की नौबत ही नहीं आती।

करीब एक घंटे तक चले इस संवाद में मोहन भागवत ने शिक्षा, रोजगार, आंदोलन, महिलाओं की भागीदारी, सामाजिक समरसता, पड़ोसी देशों से संबंध, सामाजिक माध्यमों के प्रभाव और समाज में बढ़ते बदलाव जैसे अनेक विषयों पर अपने विचार रखे।

उन्होंने कहा कि आंदोलन लोकतंत्र में अपनी बात रखने का एक वैध माध्यम है, लेकिन उसका उद्देश्य व्यवस्था में सुधार होना चाहिए, टकराव नहीं। यदि युवा अपनी आवाज उठा रहे हैं, तो उसके पीछे कोई न कोई वास्तविक समस्या अवश्य होती है। इसलिए उनकी बात को गंभीरता से सुनना और समझना आवश्यक है। उन्होंने यह भी कहा कि आंदोलन करने वाले युवाओं को राष्ट्रविरोधी कहना उचित नहीं है, क्योंकि वे देश की अपनी अगली पीढ़ी हैं।

शिक्षा व्यवस्था पर चिंता व्यक्त करते हुए भागवत ने कहा कि शिक्षा किसी भी स्थिति में व्यापार का माध्यम नहीं बननी चाहिए। हर बच्चे को अच्छी और सुलभ शिक्षा मिले, इसके लिए सरकार के साथ-साथ पूरे समाज को भी अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी। उन्होंने शिक्षा पर अधिक खर्च किए जाने का समर्थन करते हुए समाज से भी विद्यालयों के विकास में सहयोग की अपील की।

रोजगार के विषय में उन्होंने कहा कि रोजगार का अर्थ केवल सरकारी नौकरी नहीं है। कोई भी काम छोटा या बड़ा नहीं होता। मेहनत, कौशल और ईमानदारी से हर क्षेत्र में सम्मान और सफलता प्राप्त की जा सकती है।

सामाजिक माध्यमों और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के बढ़ते प्रभाव पर उन्होंने कहा कि आज झूठी और भ्रामक सामग्री तेजी से फैल रही है। इसलिए किसी भी जानकारी पर विश्वास करने से पहले उसकी सत्यता की जांच करना आवश्यक है।

महिलाओं की भागीदारी पर उन्होंने कहा कि महिलाओं को समाज के प्रत्येक क्षेत्र में समान अवसर, समान अधिकार और नेतृत्व का पूरा अधिकार मिलना चाहिए। वहीं समलैंगिक समुदाय को समाज का हिस्सा बताते हुए उन्होंने कहा कि विवाह जैसी सामाजिक व्यवस्था में किसी भी बड़े परिवर्तन से पहले समाज को उसके लिए तैयार करना आवश्यक है।

पड़ोसी देशों के साथ संबंधों पर उन्होंने कहा कि संघर्ष के समय देश और सरकार के साथ खड़ा होना चाहिए, लेकिन परिस्थितियां सामान्य होने के बाद संवाद का मार्ग भी खुला रहना चाहिए, क्योंकि स्थायी समाधान बातचीत से ही निकलता है।

आरक्षण के विषय पर उन्होंने कहा कि इस मुद्दे पर राजनीति नहीं होनी चाहिए और सामाजिक समरसता को ध्यान में रखकर आगे बढ़ना चाहिए।

कार्यक्रम के अंत में मोहन भागवत ने विद्यार्थियों के साथ उनकी शैली में उंगलियों से ताली बजाकर उनका उत्साह बढ़ाया और कहा कि उन्होंने यह तरीका आज की नई पीढ़ी से सीखा है। उनका पूरा संबोधन युवाओं के साथ विश्वास, संवाद और सहभागिता बढ़ाने के संदेश पर केंद्रित रहा

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