शरद कटियार
लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने का विचार अब केवल राजनीतिक बहस तक सीमित नहीं रह गया है। ‘एक देश, एक चुनाव’ को लेकर संसद में विधायी प्रक्रिया आगे बढ़ रही है और संयुक्त संसदीय समिति भी विभिन्न राज्यों तथा संबंधित पक्षों से विचार-विमर्श कर रही है। समिति के अध्यक्ष पीपी चौधरी का यह कहना कि आवश्यक संविधान संशोधन 2028 तक हो जाए तो 2029 में लोकसभा के साथ विधानसभा चुनाव कराने की संभावना बन सकती है, इस बहस को एक बार फिर केंद्र में ले आया है।
एक साथ चुनाव कराने के पीछे सबसे बड़ा तर्क यह है कि देश लगातार चुनावी माहौल से बाहर निकले। वर्तमान व्यवस्था में किसी न किसी राज्य में विधानसभा चुनाव चलते रहते हैं। चुनाव की घोषणा के साथ आदर्श आचार संहिता लागू होती है और कई बार सरकारी योजनाओं, विकास कार्यों तथा प्रशासनिक निर्णयों की गति प्रभावित होने की शिकायत सामने आती है। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने समिति के समक्ष पिछले तीन वर्षों में करीब 175 दिन आचार संहिता लागू रहने का उल्लेख किया था। यदि वास्तव में इतनी बड़ी अवधि चुनावी प्रतिबंधों के बीच गुजरती है तो यह निश्चित रूप से गंभीर विचार का विषय है।
इसके साथ ही बार-बार होने वाले चुनावों पर होने वाले भारी खर्च, प्रशासनिक मशीनरी की बार-बार चुनावी ड्यूटी में तैनाती और सुरक्षा बलों की व्यापक आवश्यकता को भी कम करने की दलील दी जाती है। एक साथ चुनाव होने पर राजनीतिक दलों को भी लगातार चुनावी अभियान के बजाय नीतियों, शासन और जनहित के मुद्दों पर अधिक समय देने का अवसर मिल सकता है। मतदाताओं के लिए भी बार-बार मतदान केंद्र तक जाने की स्थिति कम होगी।
लेकिन किसी भी बड़े संवैधानिक बदलाव का मूल्यांकन केवल प्रशासनिक सुविधा के आधार पर नहीं किया जा सकता। भारत जैसे विशाल और विविध लोकतंत्र में चुनाव केवल खर्च और व्यवस्था का विषय नहीं हैं, बल्कि जनता को अपनी सरकार के प्रदर्शन का मूल्यांकन करने और आवश्यकता पड़ने पर उसे बदलने का संवैधानिक अधिकार भी देते हैं। विधानसभा का पांच वर्ष पूरा होने से पहले गिर जाना या किसी राज्य में राजनीतिक परिस्थितियों के कारण मध्यावधि चुनाव की आवश्यकता पैदा होना लोकतांत्रिक व्यवस्था का स्वाभाविक हिस्सा है।
यही कारण है कि ‘एक देश, एक चुनाव’ के रास्ते में सबसे कठिन सवाल कार्यकाल के समायोजन का है। यदि किसी राज्य की निर्वाचित सरकार अपना बहुमत खो देती है तो क्या उस राज्य को अगली निर्धारित चुनाव तिथि तक इंतजार कराया जाएगा? यदि विधानसभा समय से पहले भंग होती है तो नई सरकार का कार्यकाल कितना होगा? क्या उसे केवल शेष अवधि के लिए चुना जाएगा? ऐसे सवालों का स्पष्ट संवैधानिक उत्तर जरूरी है। केवल चुनाव की तारीख एक कर देना इस जटिल समस्या का समाधान नहीं हो सकता।
दूसरा महत्वपूर्ण प्रश्न राज्यों की भूमिका का है। भारत का संविधान केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का संतुलन स्थापित करता है। विधानसभा चुनाव केवल राज्य का चुनाव नहीं, बल्कि उस राज्य की जनता के राजनीतिक अधिकार और शासन की दिशा तय करने का माध्यम हैं। इसलिए राज्यों की सहमति और उनकी संवैधानिक चिंताओं को नजरअंदाज करके कोई भी व्यवस्था लागू करना संघीय ढांचे के लिए उचित नहीं होगा।
‘एक देश, एक चुनाव’ से संबंधित संविधान का 129वां संशोधन विधेयक और केंद्रशासित प्रदेश कानूनों में संशोधन का प्रस्ताव इसी व्यापक प्रक्रिया का हिस्सा हैं। विपक्ष की मांग के बाद इन विधेयकों को संयुक्त संसदीय समिति के पास भेजा गया है। समिति द्वारा महाराष्ट्र और उत्तराखंड में राजनीतिक दलों, मुख्यमंत्रियों, अधिकारियों तथा विभिन्न संगठनों से चर्चा करना सकारात्मक कदम है। ऐसी व्यवस्था पर निर्णय व्यापक संवाद के बाद ही होना चाहिए।
इतिहास भी इस बहस में महत्वपूर्ण संदर्भ देता है। देश में 1952 से 1967 तक लोकसभा और अधिकांश विधानसभाओं के चुनाव लगभग एक साथ होते रहे थे। लेकिन राज्यों की सरकारों के समय से पहले गिरने, विधानसभाओं के भंग होने और 1970 में लोकसभा के असमय भंग होने के बाद चुनावी चक्र अलग-अलग हो गया। इसका अर्थ यह है कि एक साथ चुनाव भारत के लिए पूरी तरह नई अवधारणा नहीं है, लेकिन उस दौर की राजनीतिक परिस्थितियां आज की परिस्थितियों से अलग थीं।
दरअसल, सवाल यह नहीं होना चाहिए कि एक साथ चुनाव अच्छे हैं या बुरे। असली सवाल यह है कि क्या इस व्यवस्था को इस तरह बनाया जा सकता है कि चुनावी खर्च और प्रशासनिक बोझ कम हो, लेकिन लोकतंत्र की जवाबदेही और राज्यों की स्वायत्तता कमजोर न पड़े। यदि किसी सरकार को जनता का विश्वास खोने के बाद भी लंबे समय तक सत्ता में बनाए रखने की स्थिति पैदा होती है तो चुनाव सुधार, लोकतांत्रिक सुधार के बजाय लोकतांत्रिक अधिकारों पर अंकुश का रूप ले सकता है।
2029 का लक्ष्य इसलिए जितना महत्वाकांक्षी है, उतना ही संवेदनशील भी। संविधान संशोधन के लिए आवश्यक बहुमत जुटाना, राज्यों की सहमति हासिल करना, कार्यकाल के उतार-चढ़ाव की स्थिति का समाधान करना और राजनीतिक दलों के बीच न्यूनतम सहमति बनाना आसान नहीं होगा। संसद में संख्या बल से अधिक महत्वपूर्ण यहां संवैधानिक विश्वास और राजनीतिक सहमति होगी।
भारत को चुनाव सुधारों की आवश्यकता है, लेकिन सुधार का उद्देश्य लोकतंत्र को सुविधाजनक बनाना भर नहीं, बल्कि उसे और मजबूत करना होना चाहिए। यदि ‘एक देश, एक चुनाव’ व्यवस्था लागू होती है तो यह प्रशासनिक दक्षता के साथ-साथ जनता के अधिकारों, राज्यों की भूमिका और सरकारों की जवाबदेही की भी कसौटी पर खरी उतरनी चाहिए। 2029 में चुनाव साथ हों या नहीं, इस बहस का सबसे बड़ा लाभ तभी होगा जब इससे भारतीय लोकतंत्र को अधिक पारदर्शी, कम खर्चीला और अधिक जवाबदेह बनाने का रास्ता निकले।


