नई दिल्ली। पूर्व केंद्रीय मंत्री पी. चिदंबरम ने लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने के प्रस्ताव का विरोध करते हुए इसे असंवैधानिक बताया है। सोमवार को संसद की संयुक्त समिति के सामने अपनी बात रखते हुए चिदंबरम ने कहा कि ‘एक देश, एक चुनाव’ की व्यवस्था लागू करने का प्रस्ताव बिना पर्याप्त विचार के तैयार किया गया है और उनका जमीर इन विधेयकों के समर्थन की इजाजत नहीं देता।
चिदंबरम ने संविधान के 129वें संशोधन विधेयक और केंद्रशासित प्रदेश कानून संशोधन विधेयक का हवाला देते हुए कहा कि लोकसभा और विधानसभाओं का कार्यकाल पांच वर्ष निर्धारित है। ऐसे में उनका कार्यकाल समय से पहले समाप्त करना संविधान के मूल ढांचे के उल्लंघन के समान होगा।
तृणमूल कांग्रेस की समिति सदस्य सागरिका घोष ने भी प्रस्ताव का विरोध किया। उन्होंने आशंका जताई कि एक साथ चुनाव कराने की व्यवस्था से चुनाव आयोग को अत्यधिक अधिकार मिल सकते हैं।
भाजपा सांसद पीपी चौधरी की अध्यक्षता वाली संयुक्त समिति के सामने करीब 10 पद्म पुरस्कार प्राप्त लोगों ने भी अपनी राय रखी। इनमें कुछ ने एक साथ चुनाव कराने का समर्थन किया, जबकि कुछ ने विरोध करते हुए इसके संभावित दुष्परिणामों की आशंका जताई।
दोनों विधेयक दिसंबर 2024 में लोकसभा में पेश किए गए थे। इसके बाद इन्हें जांच के लिए संयुक्त संसदीय समिति को भेजा गया। विधेयकों का आधार पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता वाली उच्चस्तरीय समिति की सिफारिशें हैं। समिति ने लोकसभा, विधानसभा और स्थानीय निकायों के चुनाव एक निर्धारित चरणबद्ध व्यवस्था में कराने की सिफारिश की थी।
भारत में 1951-52 से 1967 तक लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव लगभग एक साथ होते रहे थे। 1957, 1962 और 1967 में भी यही व्यवस्था रही। बाद में कई राज्यों की विधानसभाएं समय से पहले भंग होने और लोकसभा के कार्यकाल में बदलाव के कारण चुनाव चक्र अलग-अलग हो गया।
पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में ‘एक देश, एक चुनाव’ पर विचार के लिए 2 सितंबर 2023 को समिति गठित की गई थी। करीब 191 दिनों के अध्ययन और विभिन्न पक्षों से चर्चा के बाद समिति ने 14 मार्च को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को अपनी रिपोर्ट सौंपी थी।


