संविधान संशोधन और राज्यों की सहमति जरूरी
नई दिल्ली। देश में लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव वर्ष 2029 में एक साथ कराए जाने की संभावना जताई गई है। ‘एक देश, एक चुनाव’ पर बनी संयुक्त संसदीय समिति के अध्यक्ष पीपी चौधरी ने सोमवार को कहा कि इसके लिए संविधान में संशोधन के साथ राज्यों की सहमति भी जरूरी होगी। उन्होंने कहा कि यदि संसद 2028 तक आवश्यक संविधान संशोधन को मंजूरी दे देती है तो 2029 के लोकसभा चुनाव के साथ विधानसभा चुनाव कराने का रास्ता खुल सकता है।
चौधरी ने कहा कि राजनीतिक दलों की इस मुद्दे पर अलग-अलग राय हो सकती है, लेकिन समिति देशहित को ध्यान में रखकर अपनी सिफारिश तैयार करेगी। उन्होंने बताया कि विभिन्न पक्षों और नागरिक समाज के लोगों से उनकी राय जानने के लिए चर्चा की जा रही है।
लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने के लिए संविधान का 129वां संशोधन विधेयक, 2024 और केंद्रशासित प्रदेश कानून संशोधन विधेयक, 2024 लाए गए हैं। विपक्ष की मांग के बाद दोनों विधेयकों को पीपी चौधरी की अध्यक्षता वाली 31 सदस्यीय संयुक्त संसदीय समिति के पास भेजा गया था। इन विधेयकों को पारित कराने के लिए संसद में दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होगी।
संयुक्त समिति पहले महाराष्ट्र और उत्तराखंड का दौरा कर संबंधित पक्षों से चर्चा कर चुकी है। महाराष्ट्र में समिति ने मुख्यमंत्री, राजनीतिक दलों, प्रशासनिक अधिकारियों और विभिन्न संस्थाओं से बातचीत की थी। उत्तराखंड में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी सहित अधिकारियों और संगठनों से चर्चा हुई। धामी ने समिति को बताया था कि बार-बार चुनाव होने के कारण पिछले तीन वर्षों में करीब 175 दिन आचार संहिता लागू रहने से सरकारी काम प्रभावित हुआ।
‘एक देश, एक चुनाव’ की व्यवस्था के लिए पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में 2 सितंबर 2023 को उच्चस्तरीय समिति गठित की गई थी। समिति ने विभिन्न पक्षों और विशेषज्ञों से चर्चा के बाद 14 मार्च को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को अपनी रिपोर्ट सौंपी थी।
भारत में 1952 से 1967 तक लोकसभा और अधिकांश राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ होते रहे थे। 1967 के बाद कई राज्यों की सरकारें गिरने और विधानसभाएं समय से पहले भंग होने लगीं। 1970 में लोकसभा भी समय से पहले भंग हो गई और 1971 में मध्यावधि चुनाव हुए। इसके बाद लोकसभा और विधानसभा चुनावों का चक्र अलग-अलग हो गया।
अब प्रस्तावित व्यवस्था के तहत चुनावी चक्र को फिर से एक करने की कोशिश की जा रही है। हालांकि, इसे लागू करने के लिए संवैधानिक बदलाव और राज्यों की सहमति सबसे बड़ी चुनौती होगी।


