शरद कटियार
कुछ खबरें केवल पढ़ी नहीं जातीं, वे भीतर तक उतर जाती हैं। जालौन के सींगपुरा गांव की छह बहनों की कहानी भी ऐसी ही है। एक परिवार, जो कभी बच्चों की हंसी से आबाद था, आज अपने ही सवालों के बीच खड़ा है। मां-बाप पहले ही दुनिया छोड़ चुके थे और जिस दादी ने माता-पिता के बाद इन बच्चियों को अपने आंचल में संभाला था, अब वह भी नहीं रहीं।
छह बहनों में सबसे बड़ी अंजली महज 14 वर्ष की है। जिस उम्र में उसके हाथों में किताबें होनी चाहिए थीं, जिस उम्र में उसे अपने भविष्य के सपने देखने चाहिए थे, उसी उम्र में उसके सामने पांच छोटी बहनों की जिम्मेदारी खड़ी हो गई है। यह केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि उस व्यवस्था के सामने खड़ा एक बड़ा सवाल है जो समाज के सबसे कमजोर बच्चों के लिए सुरक्षा का दावा करती है।
अंजली के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि वह अपनी पांच बहनों को कैसे संभालेगी। भोजन, कपड़े, पढ़ाई, बीमारी और सुरक्षित रहने की चिंता,इन सबका बोझ एक किशोरी के कंधों पर आ गया है।
बच्चों से यह उम्मीद करना कि वे अपने दम पर जीवन की इतनी बड़ी लड़ाई लड़ लेंगे, किसी भी संवेदनशील समाज के लिए चिंता का विषय होना चाहिए। अनाथ बच्चों के लिए सरकार की योजनाएं हैं, बाल संरक्षण की व्यवस्थाएं हैं, प्रशासनिक तंत्र है और समाजसेवी संस्थाएं भी हैं। लेकिन सवाल यह है कि इन व्यवस्थाओं की पहुंच इन छह बच्चियों तक कब और कितनी प्रभावी ढंग से पहुंचेगी?
इन बच्चियों का कच्चा मकान भी बारिश के बाद जर्जर स्थिति में पहुंच चुका है। यानी समस्या केवल पेट भरने की नहीं है। उनके सामने सिर पर सुरक्षित छत का संकट भी है।
एक तरफ घर में कोई वयस्क संरक्षक नहीं बचा और दूसरी तरफ रहने का सुरक्षित इंतजाम नहीं। ऐसी स्थिति में बच्चियों की सुरक्षा, शिक्षा और भविष्य को लेकर गंभीर चिंता स्वाभाविक है।
यह वह क्षण है जब सरकारी फाइलों से निकलकर योजनाओं को जमीन पर दिखाई देना चाहिए। प्रशासन को केवल आर्थिक सहायता देकर अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं माननी चाहिए, बल्कि यह सुनिश्चित करना चाहिए कि बच्चियों की शिक्षा, पोषण, सुरक्षा और आवास की स्थायी व्यवस्था हो।
अक्सर ऐसी खबरें सामने आने के बाद समाज के लोग तत्काल मदद के लिए आगे आते हैं। यह अच्छी बात है, लेकिन छह बच्चियों का भविष्य केवल किसी व्यक्ति की दया या अस्थायी सहायता पर निर्भर नहीं रह सकता।
इन बच्चियों को भी शिक्षा पाने, सुरक्षित घर में रहने और सम्मान के साथ जीवन जीने का उतना ही अधिकार है जितना किसी संपन्न परिवार के बच्चे को।
जरूरत इस बात की है कि प्रशासन इन बच्चियों के मामले को संवेदनशीलता के साथ ले और उनकी स्थिति का तत्काल आकलन कर बाल संरक्षण की सभी आवश्यक व्यवस्थाएं सुनिश्चित करे। साथ ही यह भी देखा जाए कि उनकी पढ़ाई किसी भी परिस्थिति में बाधित न हो।
अंजली का यह कहना कि अब हम छह बहनें ही रह गई हैं, कौन संभालेगा? दरअसल केवल एक बच्ची की आवाज नहीं है। यह हमारे समाज और व्यवस्था से पूछा गया सवाल है।
इस सवाल का जवाब केवल आश्वासन से नहीं, बल्कि कार्रवाई से दिया जाना चाहिए।
आज जरूरत इन छह बहनों को सहानुभूति की नजर से देखने से आगे बढ़कर उनके भविष्य की जिम्मेदारी सुनिश्चित करने की है। प्रशासन, समाज और सक्षम नागरिक—सभी को मिलकर यह तय करना होगा कि माता-पिता और दादी को खो चुकी इन बच्चियों को अपना भविष्य भी न खोना पड़े।
किसी भी सभ्य समाज की असली पहचान उसकी ऊंची इमारतें नहीं, बल्कि यह होती है कि वह अपने सबसे कमजोर और बेसहारा बच्चों के साथ कितना मजबूती से खड़ा होता है।
इन छह बहनों की कहानी मदद की गुहार भर नहीं है,यह हमारी संवेदनशीलता और व्यवस्था, दोनों की परीक्षा है।


