लेखक: सूर्या अग्निहोत्री
(डिप्टी एडिटर यूथ इंडिया न्यूज ग्रुप)
बचपन में एक ही आंगन में खेलने वाले, एक ही थाली में खाना खाने वाले और एक-दूसरे के बिना एक पल भी न रहने वाले भाई, आखिर बड़े होते-होते इतने दूर कैसे हो जाते हैं? यह सवाल आज हजारों परिवारों के सामने खड़ा है। जिस भाई के साथ बचपन की यादें जुड़ी होती हैं, वही कई बार उम्र बढ़ने के साथ एक-दूसरे का सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी बन जाता है। यह केवल एक परिवार की कहानी नहीं, बल्कि बदलते समाज की एक कड़वी सच्चाई बनती जा रही है।
भारतीय संस्कृति में भाई का रिश्ता केवल खून का रिश्ता नहीं, बल्कि विश्वास, सुरक्षा और त्याग का प्रतीक माना गया है। इतिहास और परंपराएं इस बात की गवाह हैं कि जब भाई एकजुट होकर खड़े होते हैं तो बड़ी से बड़ी मुश्किलें भी छोटी पड़ जाती हैं। लेकिन आज के दौर में यह रिश्ता कई जगहों पर स्वार्थ, ईर्ष्या और लालच की भेंट चढ़ता दिखाई दे रहा है।
आज समाज में ऐसे अनेक उदाहरण देखने को मिलते हैं जहाँ एक भाई दूसरे भाई की तरक्की देखकर खुश होने के बजाय असहज महसूस करता है। वह नहीं चाहता कि उसका भाई उससे आगे निकले या उससे अधिक सम्मान और सफलता प्राप्त करे। प्रतिस्पर्धा की यह भावना धीरे-धीरे रिश्तों में दूरियां पैदा कर देती है और प्रेम की जगह मनमुटाव ले लेता है।
संपत्ति, जमीन-जायदाद और धन के विवाद भी भाई-भाई के रिश्तों को कमजोर करने वाले प्रमुख कारण बन गए हैं। कई लोग चाहते हैं कि परिवार की पूरी संपत्ति उन्हीं के अधिकार में आ जाए और दूसरे भाई को उसका उचित हिस्सा न मिले। ऐसे विवाद न केवल परिवारों को तोड़ते हैं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों तक कटुता का माहौल बना देते हैं।
कुछ लोग अपने भाई को पीछे करने के लिए उसकी पीठ पीछे बुराई करते हैं, उसके बारे में गलत बातें फैलाते हैं या उसके कामों में बाधा डालने का प्रयास करते हैं। समाज में ऐसी मान्यताएं और चर्चाएं भी सुनने को मिलती हैं कि कुछ लोग अपने स्वार्थ या ईर्ष्या के कारण तंत्र-मंत्र, टोना-टोटका या तंत्र विद्या जैसी बातों का सहारा लेकर दूसरे व्यक्ति, यहाँ तक कि अपने भाई का भी अहित चाहने लगते हैं। चाहे इन बातों की वास्तविकता पर अलग-अलग मत हो सकते हैं, लेकिन यह सोच ही इस बात को दर्शाती है कि मनुष्य किस हद तक नकारात्मकता और द्वेष से भर सकता है।
हमारे बुजुर्ग हमेशा कहते आए हैं कि अपने भाई का हक मारकर या उसके अधिकारों का हनन करके कोई व्यक्ति वास्तविक सुख और शांति प्राप्त नहीं कर सकता। दूसरों का हिस्सा छीनकर बनाई गई समृद्धि लंबे समय तक टिकाऊ नहीं होती। रिश्तों का मूल्य किसी भी संपत्ति से कहीं अधिक होता है।
भाई ही भाई की सबसे बड़ी ताकत और सबसे मजबूत हथियार होता है। यदि भाई साथ हो तो व्यक्ति जीवन की किसी भी चुनौती का सामना करने का साहस रखता है। लेकिन जब भाई ही साथ न दे, तो कई बार जीती हुई बाजी भी हार में बदल जाती है। इसलिए आवश्यक है कि हम ईर्ष्या और स्वार्थ से ऊपर उठकर रिश्तों को बचाने का प्रयास करें।
आज आवश्यकता इस बात की है कि परिवारों में संवाद, विश्वास और प्रेम को बढ़ावा दिया जाए। भाई की सफलता को अपनी सफलता समझा जाए और उसके अधिकारों का सम्मान किया जाए। क्योंकि टूटे हुए रिश्ते केवल परिवार को नहीं, बल्कि पूरे समाज को कमजोर करते हैं।
इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं।


