32.9 C
Lucknow
Thursday, July 23, 2026

अर्थयोग इतना भारी हुआ कि पत्रकारिता व्यावसायिक बन गई

Must read

शरद कटियार

पत्रकारिता कभी मिशन हुआ करती थी। इसका उद्देश्य सत्ता से सवाल पूछना, समाज को सच से परिचित कराना और लोकतंत्र को मजबूत बनाना था। अखबार और समाचार संस्थान जनता की आवाज़ माने जाते थे। पत्रकार का परिचय उसकी कलम, उसके साहस और उसकी निष्पक्षता से होता था, लेकिन समय के साथ पत्रकारिता का स्वरूप तेजी से बदला। बढ़ती आर्थिक प्रतिस्पर्धा, कॉरपोरेट निवेश, विज्ञापन आधारित मॉडल, टीआरपी की होड़ और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर क्लिक की दौड़ ने पत्रकारिता को एक बड़े उद्योग में बदल दिया। आज स्थिति यह है कि कई बार खबर का महत्व उसकी सच्चाई से नहीं, बल्कि उससे मिलने वाली कमाई और लोकप्रियता से तय होता दिखाई देता है।

भारतीय मीडिया उद्योग आज हजारों करोड़ रुपये का कारोबार है। बड़े मीडिया समूहों की आय का बड़ा हिस्सा विज्ञापन, प्रायोजित कार्यक्रमों, ब्रांड साझेदारी और डिजिटल ट्रैफिक से आता है। जब किसी संस्थान की आर्थिक निर्भरता बाजार पर बढ़ जाती है, तब संपादकीय स्वतंत्रता पर दबाव भी बढ़ता है। यही कारण है कि आज अक्सर यह सवाल उठता है कि क्या खबरें जनहित के आधार पर चुनी जाती हैं या फिर बाजार और राजनीतिक हितों को ध्यान में रखकर?

लोकतंत्र में मीडिया को चौथा स्तंभ इसलिए कहा गया क्योंकि उसका दायित्व सरकार, विपक्ष, न्यायपालिका और प्रशासन सभी पर समान रूप से निगरानी रखना है। लेकिन जब मीडिया पर पक्षपात के आरोप लगने लगें, जब राजनीतिक दल उसे अपने पक्ष या विपक्ष का माध्यम बताने लगें और जब जनता भी उसकी निष्पक्षता पर प्रश्न उठाने लगे, तब यह केवल मीडिया का संकट नहीं बल्कि लोकतंत्र के लिए भी चिंता का विषय बन जाता है। आज लगभग हर बड़ा राजनीतिक दल किसी न किसी समय मीडिया पर पक्षधर होने का आरोप लगाता है। विपक्ष लगातार आरोप लगाता है कि मीडिया का एक बड़ा वर्ग सत्ता के पक्ष में खड़ा दिखाई देता है, जबकि सत्ता पक्ष कई बार मीडिया पर नकारात्मक खबरें दिखाने का आरोप लगाता है। इस खींचतान के बीच सबसे बड़ा नुकसान जनता के भरोसे का हुआ है।

सबसे अधिक चिंता की बात यह है कि अब देश की युवा पीढ़ी भी मुख्यधारा की मीडिया पर पहले जैसा भरोसा नहीं जता रही। डिजिटल युग में लाखों युवा समाचार के लिए सोशल मीडिया, यूट्यूब चैनलों और स्वतंत्र कंटेंट क्रिएटर्स पर निर्भर हो रहे हैं। यह बदलाव केवल तकनीकी नहीं, बल्कि विश्वास के संकट का संकेत भी है। यदि लोग समाचार संस्थानों के बजाय अप्रमाणित स्रोतों पर अधिक भरोसा करने लगें तो अफवाह, दुष्प्रचार और फेक न्यूज़ का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।

यह अविश्वास केवल भावना नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों में भी दिखाई देता है। रेउटर्स इंस्टिट्यूट डिजिटल न्यूज़ रिपोर्ट 2026 के अनुसार भारत में केवल 39 प्रतिशत लोग समाचारों पर भरोसा करते हैं, जबकि बड़ी संख्या में लोग समाचारों से दूरी बनाने की बात स्वीकार करते हैं। यह दर्शाता है कि मीडिया के सामने सबसे बड़ी चुनौती अब पाठक या दर्शक बढ़ाना नहीं, बल्कि अपना खोता हुआ विश्वास वापस पाना है।

विश्व स्तर पर भी भारतीय मीडिया की स्थिति चिंता पैदा करती है। रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (आरएसएफ ) के वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स 2026 में भारत 180 देशों में 157वें स्थान पर है। यह सूचकांक पत्रकारों की स्वतंत्रता, सुरक्षा, राजनीतिक दबाव, आर्थिक प्रभाव और कानूनी वातावरण जैसे कई मानकों के आधार पर तैयार किया जाता है। हालांकि इस सूचकांक की पद्धति को लेकर समय-समय पर अलग-अलग मत सामने आते रहे हैं, फिर भी यह विश्व स्तर पर व्यापक रूप से उद्धृत रिपोर्टों में शामिल है। भारत जैसे दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के लिए यह रैंकिंग निश्चित रूप से गंभीर चर्चा का विषय है।

यह भी सच है कि पूरे मीडिया को एक ही नजर से देखना न्यायसंगत नहीं होगा। आज भी देश में हजारों पत्रकार ऐसे हैं जो सीमित संसाधनों में भी निष्पक्ष और खोजी पत्रकारिता कर रहे हैं। कई पत्रकार अपनी जान जोखिम में डालकर भ्रष्टाचार, अपराध और जनहित के मुद्दों को सामने लाते हैं। अनेक छोटे और क्षेत्रीय समाचार संस्थान बिना किसी बड़े आर्थिक सहयोग के भी समाज की आवाज़ बने हुए हैं। इसलिए समस्या पत्रकारिता की आत्मा में नहीं, बल्कि उस व्यवस्था में है जिसमें आर्थिक दबाव, राजनीतिक प्रभाव, तकनीकी प्रतिस्पर्धा और बाजार की शक्तियां लगातार संपादकीय निर्णयों को प्रभावित कर रही हैं।

पत्रकारिता का भविष्य केवल नई तकनीक या कृत्रिम बुद्धिमत्ता से तय नहीं होगा। उसका भविष्य इस बात से तय होगा कि क्या मीडिया संस्थान फिर से जनता का विश्वास जीत पाते हैं। यदि समाचार सत्य, संतुलन और जनहित के आधार पर प्रस्तुत होंगे तो पाठक और दर्शक वापस लौटेंगे। लेकिन यदि पत्रकारिता केवल लाभ कमाने का माध्यम बनकर रह गई तो लोकतंत्र का सबसे महत्वपूर्ण प्रहरी धीरे-धीरे अपनी विश्वसनीयता खो देगा।

पत्रकारिता का वास्तविक अर्थ सत्ता का समर्थन या विरोध करना नहीं, बल्कि सत्य का साथ देना है। लोकतंत्र में मीडिया की सबसे बड़ी पूंजी न विज्ञापन है, न टीआरपी और न ही डिजिटल व्यूज़। उसकी सबसे बड़ी पूंजी जनता का विश्वास है। जिस दिन यह विश्वास पूरी तरह समाप्त हो जाएगा, उस दिन सबसे बड़ा नुकसान किसी मीडिया संस्थान का नहीं, बल्कि भारत जैसे लोकतांत्रिक राष्ट्र का होगा।

Must read

More articles

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Latest article