शरद कटियार
नेपाल में 26 अगस्त को आई भीषण बाढ़ और भूस्खलन ने भारी तबाही मचाई है। 11 दिन बाद भी राहत-बचाव अभियान जारी है। 1344 लोगों की मौत और 5300 से अधिक लोगों के लापता होने का आंकड़ा इस आपदा की भयावहता बताता है। लेकिन इसी त्रासदी के बीच दो लोगों का जिंदा मिलना उम्मीद की बड़ी किरण है।
नुवाकोट में 64 वर्षीय चंद्रिका श्रेष्ठ का घर के मलबे और मोटी कीचड़ के नीचे से जीवित निकलना बचाव दलों के साहस और लगातार प्रयासों का परिणाम है। वहीं अपर त्रिशूली-1 जलविद्युत परियोजना की करीब 225 मीटर लंबी सुरंग से चीनी नागरिक को सुरक्षित बाहर निकाला गया। दोनों घटनाएं साबित करती हैं कि कठिन परिस्थितियों में भी जीवन बचाने की कोशिश कभी व्यर्थ नहीं जाती।
नेपाल की करीब 12 जलविद्युत परियोजनाओं में काम करने वाले सैकड़ों कर्मचारियों के लापता होने की आशंका चिंता बढ़ाती है। बड़ी संख्या में लोगों के सुरंगों में फंसे होने की संभावना के बीच भारत, चीन, दक्षिण कोरिया और अमेरिका की विशेषज्ञ टीमें तलाश अभियान में जुटी हैं। ऐसे समय में अंतरराष्ट्रीय सहयोग मानवता की सबसे मजबूत तस्वीर पेश करता है।
भारत ने राहत सामग्री और विशेषज्ञ दल भेजकर पड़ोसी धर्म निभाया है। सड़क, पुल और बिजली परियोजनाओं को हुए नुकसान के कारण राहत पहुंचाना भी चुनौतीपूर्ण है। इसलिए बचाव के साथ प्रभावित परिवारों के पुनर्वास और जरूरी सुविधाओं की बहाली पर भी तत्काल ध्यान देना होगा।
इस त्रासदी से नेपाल ही नहीं, पूरे हिमालयी क्षेत्र को सबक लेने की जरूरत है। प्राकृतिक आपदाओं को रोका नहीं जा सकता, लेकिन बेहतर पूर्व चेतावनी, सुरक्षित निर्माण, मजबूत आपदा प्रबंधन और त्वरित बचाव व्यवस्था से जान-माल का नुकसान कम किया जा सकता है।
मलबे से निकली दो जिंदगियां हजारों परिवारों के लिए उम्मीद का संदेश हैं। तलाश तब तक जारी रहनी चाहिए, जब तक हर संभावित जिंदगी तक पहुंचने की कोशिश पूरी न हो जाए। आपदा के बीच इंसानियत की असली परीक्षा यही है कि हम आखिरी उम्मीद तक साथ खड़े रहें।


