31 C
Lucknow
Friday, September 4, 2026

जन्माष्टमी: कान्हा का जन्म तभी सार्थक, जब जीवन में धर्म और कर्म दोनों उतरें

Must read

शरद कटियार

जन्माष्टमी केवल भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का उत्सव नहीं है। यह उस चेतना के जागरण का पर्व है, जो हमें अन्याय के सामने खड़े होने, सत्य का साथ देने और कठिन परिस्थितियों में भी अपने कर्तव्य से पीछे न हटने की प्रेरणा देती है। आधी रात को मंदिरों में गूंजता शंख, घंटियों की आवाज और ‘नंद के आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की’ का उद्घोष केवल धार्मिक उल्लास नहीं, बल्कि उस विश्वास की अभिव्यक्ति है कि जब अंधकार बढ़ता है तो प्रकाश का जन्म अवश्य होता है।

श्रीकृष्ण का जीवन हमें सबसे बड़ा संदेश कर्म का देता है। कुरुक्षेत्र में अर्जुन जब मोह और संशय में घिर गए, तब कृष्ण ने उन्हें भाग्य के भरोसे बैठने की शिक्षा नहीं दी, बल्कि कर्म के मार्ग पर चलने का संदेश दिया। आज जब समाज अनेक चुनौतियों से गुजर रहा है, तब गीता का वही संदेश पहले से अधिक प्रासंगिक है—कर्तव्य से भागना समाधान नहीं, कर्तव्य को ईमानदारी से निभाना ही धर्म है।

कृष्ण ने अन्याय को कभी स्वीकार नहीं किया। कंस हो या कौरवों का अहंकार, उन्होंने सत्ता और शक्ति के सामने सत्य को कमजोर नहीं पड़ने दिया। यही कारण है कि जन्माष्टमी हमें यह सवाल भी पूछती है कि क्या हम अपने आसपास के अन्याय को देखकर चुप तो नहीं हैं? क्या हम केवल मंदिर में कृष्ण को खोजते हैं या अपने आचरण में भी उनके विचारों को स्थान देते हैं?

आज समाज को कृष्ण की सबसे ज्यादा जरूरत घृणा नहीं, विवेक के रूप में है। कृष्ण ने संवाद किया, समझाया, शांति का प्रयास किया और जब शांति के सभी रास्ते बंद हुए, तब अधर्म के विरुद्ध खड़े हुए। इसलिए कृष्ण को किसी एक वर्ग, जाति या राजनीतिक विचारधारा की सीमा में बांधना उनके विराट व्यक्तित्व को छोटा करना होगा। कृष्ण सबके हैं और उनका संदेश भी सबके लिए है।

आज की राजनीति में भी कृष्ण के नाम का इस्तेमाल खूब होता है, लेकिन असली परीक्षा नाम लेने की नहीं, नीति में कृष्ण के मूल्यों को उतारने की है। गरीब के चेहरे पर मुस्कान, किसान को सम्मान, युवाओं को अवसर, महिलाओं को सुरक्षा, कमजोर को न्याय और समाज में परस्पर सम्मान—यदि ये बातें हमारे सार्वजनिक जीवन का हिस्सा बनें, तभी कृष्ण की पूजा वास्तव में सार्थक होगी।

जन्माष्टमी का दीपक हमें यह याद दिलाता है कि अंधेरा कितना भी गहरा क्यों न हो, एक छोटी-सी रोशनी उसे चुनौती देने की ताकत रखती है। आज जरूरत है कि हम अपने भीतर के अहंकार, स्वार्थ, छल और भय के ‘कंस’ को पहचानें और उसे समाप्त करने का संकल्प लें।

कृष्ण जन्मे थे कारागार में, लेकिन उनका संदेश किसी दीवार में कैद नहीं हुआ। वह युगों को पार करता हुआ आज भी हमारे बीच मौजूद है।

इस जन्माष्टमी पर उत्सव जरूर मनाइए, माखन-मिश्री जरूर चढ़ाइए, मंदिरों में दर्शन जरूर कीजिए..लेकिन साथ में कृष्ण का एक संदेश अपने जीवन में भी उतारिए,अन्याय के सामने मौन नहीं, सत्य के पक्ष में कर्म।

यही कृष्ण हैं।

यही गीता का सार है।
और शायद आज की सबसे बड़ी जरूरत भी।

Must read

More articles

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Latest article