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Thursday, April 23, 2026

एक्शन मे मैडम लाठर :स्कूल वाहनों पर एआरटीओ की बड़ी कार्रवाई, 35 पर शिकंजा, कई मे हड़कंप 

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– डीएम के टेढ़े रुख के बाद हरकत मे आया एआरटीओ कार्यालय

– लेकिन नवाबगंज के दो स्कूलों पर ढिलाई

– पुराने हमले की याद ने बढ़ाई सियासी गर्मी

फर्रुखाबाद। जिलाधिकारी डॉक्टर अंकुर लाठर ही ताबड़तोड़ एक्शन के बीच जनपद में स्कूल वाहनों की फिटनेस और सुरक्षा मानकों को लेकर अब तक लापरवाह एआरटीओ विभाग ने अचानक सख्ती दिखाते हुए बीते बुधवार 35 वाहनों पर कार्रवाई कर दी। बिना परमिट, फिटनेस और सुरक्षा मानकों की अनदेखी करने वाले वाहनों के खिलाफ चालान और सीज की कार्रवाई से हड़कंप मचा दिया । लेकिन इस कार्रवाई के बीच एक बड़ा सवाल उठ खड़ा हुआ है क्या कानून सबके लिए बराबर है?

स्थानीय सूत्रों और लोगों का आरोप है कि क़स्बा नवाबगंज-चांदपुर स्थित एसकेएम इंटर कॉलेज और कृष्णा पब्लिक स्कूल के वाहनों पर कोई अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई। जबकि इन संस्थानों के वाहनों में भी खामियां लंबे समय से सामने आती रही हैं। यही वजह है कि अब एआरटीओ की कार्रवाई पर चयनात्मकता के आरोप लगने लगे हैं।

मामले को और गंभीर बनाता है वह पुराना घटनाक्रम, जब पूर्व एआरटीओ सुधेश तिवारी ने इसी तरह स्कूल वाहनों पर शिकंजा कसा था। उस दौरान एसकेएम इंटर कॉलेज और कृष्णा पब्लिक स्कूल प्रबंधक और खुद को वकील बताने वाले माफिया अनुपम दुबे के बेहद करीबी शातिर अपराधी अवधेश मिश्रा ने अपने माफिया साथी डॉ अनुपम दुबे व संजीव परिया (अब दिवंगत ) के संरक्षण मे अपने साथियों के साथ कचहरी परिसर में अधिकारी पर जानलेवा हमला करवा दिया था। यहाँ तक कि जिला यात्री कर अधिकारी को खुलेआम उनके कार्यालय में पीटा गया जिसने पूरे प्रशासनिक तंत्र को हिला दिया था।और एआरटीओ तिवारी नौकरी से ही इस्तीफा देकर चले गए थे।

अब मौजूदा कार्रवाई के बीच वही पुरानी घटना फिर चर्चा में है। सवाल यह है कि क्या उसी दबाव और भय का असर आज भी विभागीय कार्रवाई पर दिखाई दे रहा है? या फिर यह महज संयोग है कि कुछ संस्थान जांच के दायरे से बाहर रह गए?

परिवहन विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, उत्तर प्रदेश में हर साल स्कूल वाहनों से जुड़े हादसों में दर्जनों बच्चों की जान जोखिम में पड़ती है। सुप्रीम कोर्ट और परिवहन विभाग की गाइडलाइन के अनुसार, हर स्कूल वाहन में फिटनेस, फायर सेफ्टी, जीपीएस, ड्राइवर वेरिफिकेशन और स्पीड गवर्नर अनिवार्य है लेकिन जमीनी हकीकत अक्सर इन नियमों से कोसों दूर नजर आती है।

अभिभावकों का कहना है कि कार्रवाई सिर्फ कागजों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। जिन स्कूलों में खामियां हैं, वहां बिना दबाव के सख्त कदम उठाए जाएं।

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