शरद कटियार
बिहार में भरत भूषण तिवारी की मौत को लेकर पैदा हुआ विवाद केवल एक कथित एनकाउंटर का मामला नहीं है, बल्कि यह उस लोकतांत्रिक व्यवस्था की परीक्षा भी है जो स्वयं को संविधान, कानून और नागरिक अधिकारों पर आधारित बताती है। जिस घटना ने पूरे प्रदेश में बहस छेड़ दी है, उसने कई ऐसे प्रश्न खड़े कर दिए हैं जिनका उत्तर केवल पुलिस के आधिकारिक बयान से नहीं, बल्कि निष्पक्ष न्यायिक जांच से ही मिल सकता है।
किसी भी लोकतंत्र में राज्य की सबसे बड़ी शक्ति उसके हथियार नहीं, बल्कि जनता का विश्वास होता है। जब कोई नागरिक पुलिस कार्रवाई में मारा जाता है और उसके बाद परिस्थितियों को लेकर विरोधाभासी दावे सामने आते हैं, तो यह विश्वास डगमगाने लगता है। यदि किसी व्यक्ति के बारे में यह कहा जा रहा है कि उसने आत्मसमर्पण की कोशिश की थी, हथियार डाल दिए थे या फिर वह तत्काल कोई खतरा नहीं था, तो ऐसे दावों को गंभीरता से जांचा जाना चाहिए। वहीं यदि पुलिस का पक्ष अलग है, तो उसे भी तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर परखा जाना चाहिए।
भारतीय संविधान का मूल दर्शन यह है कि किसी व्यक्ति को अपराधी घोषित करने का अधिकार केवल न्यायपालिका के पास है। पुलिस का काम अपराध की जांच करना और कानून व्यवस्था बनाए रखना है। यदि किसी व्यक्ति पर गंभीर आरोप हैं, तो उसका स्थान अदालत के कटघरे में होना चाहिए, न कि बिना पूर्ण न्यायिक प्रक्रिया के मृत्यु के मुहाने पर। यही कारण है कि हर मुठभेड़ के बाद सबसे पहला सवाल उठता है कि क्या बल प्रयोग अंतिम और अपरिहार्य विकल्प था या नहीं।
भरत भूषण तिवारी प्रकरण में सबसे अधिक चिंता इस बात को लेकर व्यक्त की जा रही है कि क्या घटनास्थल पर मौजूद परिस्थितियों को पूरी निष्पक्षता से सामने लाया जा रहा है। क्या घटनास्थल के वीडियो, तकनीकी साक्ष्य, फोरेंसिक रिपोर्ट, कॉल रिकॉर्ड और प्रत्यक्षदर्शियों के बयान सार्वजनिक जांच का हिस्सा बनेंगे? क्या मृतक के परिवार को निष्पक्ष सुनवाई का अवसर मिलेगा? क्या जांच एजेंसियां केवल औपचारिकता निभाएंगी या फिर सच्चाई तक पहुंचने का वास्तविक प्रयास करेंगी? यही वे प्रश्न हैं जिनका उत्तर देश जानना चाहता है।
इतिहास गवाह है कि जब-जब किसी विवादित मुठभेड़ पर सवाल उठे हैं, तब-तब न्यायिक जांच और स्वतंत्र पड़ताल ने ही सच्चाई को सामने लाने का काम किया है। लोकतंत्र में किसी भी संस्था की प्रतिष्ठा तभी बनी रहती है जब वह स्वयं को जांच और जवाबदेही के लिए प्रस्तुत करे। पुलिस बल की प्रतिष्ठा भी इसी में है कि वह निष्पक्ष जांच से न डरे और यदि उसके अधिकारी सही हैं तो सच्चाई स्वयं उनके पक्ष में खड़ी होगी।
इस प्रकरण का एक सामाजिक पक्ष भी है। आज देश का युवा बेरोजगारी, शिक्षा, भ्रष्टाचार, स्थानीय समस्याओं और शासन की जवाबदेही जैसे मुद्दों पर अपनी आवाज बुलंद कर रहा है। लोकतंत्र की खूबसूरती ही यह है कि नागरिक सरकारों से सवाल पूछ सकते हैं, वादों की याद दिला सकते हैं और अपनी मांगों को शांतिपूर्ण तरीके से रख सकते हैं। यदि किसी व्यक्ति ने वास्तव में जनहित, सामाजिक मुद्दों या राजनीतिक वादों को लेकर संघर्ष किया था, तो उसकी आवाज और उसके विचारों का मूल्यांकन अलग विषय है; लेकिन उसकी मृत्यु की परिस्थितियों की निष्पक्ष जांच होना उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है।
यह भी सच है कि किसी व्यक्ति के विचार, लोकप्रियता या आंदोलनकारी छवि उसे कानून से ऊपर नहीं बनाती। यदि उस पर कोई आरोप थे तो उनका फैसला न्यायालय को करना था। लेकिन उतना ही सच यह भी है कि कानून के शासन में किसी भी नागरिक का जीवन राज्य की जवाबदेही के दायरे में आता है। इसलिए हर विवादित मौत पर सवाल उठाना लोकतंत्र-विरोधी नहीं, बल्कि लोकतंत्र को मजबूत करने की प्रक्रिया है।
आज आवश्यकता किसी राजनीतिक लाभ-हानि की बहस की नहीं है। आवश्यकता इस बात की है कि न्यायिक जांच पूरी पारदर्शिता से हो, सभी पक्षों को सुना जाए, तकनीकी और वैज्ञानिक साक्ष्यों की जांच हो और जो भी सत्य हो उसे बिना किसी दबाव के जनता के सामने रखा जाए। यदि पुलिस की कार्रवाई उचित थी तो वह भी स्पष्ट होना चाहिए और यदि कहीं कोई चूक या अति हुई है तो उसकी जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए।
लोकतंत्र की असली पहचान यही है कि वहां सत्ता से अधिक महत्व सत्य का होता है। भरत भूषण तिवारी प्रकरण में भी देश को किसी पूर्वनिर्धारित निष्कर्ष की नहीं, बल्कि तथ्यों पर आधारित न्याय की आवश्यकता है। क्योंकि न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि होता हुआ दिखाई भी देना चाहिए। जब तक हर प्रश्न का संतोषजनक उत्तर नहीं मिल जाता, तब तक यह मामला केवल एक एनकाउंटर की कहानी नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक जवाबदेही की कसौटी बना रहेगा।


