– विरोध के बीच भी बीजेपी से खुश दिख रहा आम जनमानस
– केवल सिटिंग से विरोध आ रहा सामने
– बीजेपी नें टिकटें बदल दीं तो फिर सत्ता में होगा दखल
शरद कटियार
उत्तर प्रदेश की राजनीति इन दिनों एक दिलचस्प मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है। एक तरफ सत्ता विरोधी लहर यानी एंटी इनकम्बेंसी की चर्चा तेज है, तो दूसरी तरफ जमीनी स्तर पर बड़ी संख्या में लोग अब भी बीजेपी सरकार के पक्ष में खड़े नजर आ रहे हैं। सवाल उठ रहा है कि आखिर लगातार विरोध, महंगाई, बेरोजगारी और प्रशासनिक शिकायतों के बावजूद जनता का एक बड़ा वर्ग भाजपा से नाराज क्यों नहीं दिख रहा?
प्रदेश में बुलडोजर कार्रवाई, माफियाओं पर शिकंजा, अवैध कब्जों पर प्रहार और सरकारी सिस्टम में बढ़ती सख्ती ने भाजपा की छवि “कठोर लेकिन निर्णायक सरकार” के रूप में बनाई है। गांवों और कस्बों में आज भी बड़ी संख्या में लोग कानून-व्यवस्था को योगी सरकार की सबसे बड़ी ताकत मानते हैं। यही कारण है कि विपक्ष के तमाम हमलों के बावजूद भाजपा का कोर वोटर पूरी तरह खिसकता नजर नहीं आ रहा।
हालांकि दूसरी तस्वीर भी कम गंभीर नहीं है। युवाओं में भर्ती परीक्षाओं को लेकर नाराजगी है। पेपर लीक, संविदा भर्ती, रोजगार संकट और महंगाई जैसे मुद्दे सरकार के खिलाफ असंतोष पैदा कर रहे हैं। शिक्षकों, कर्मचारियों और छोटे व्यापारियों के बीच भी कई फैसलों को लेकर नाराजगी है। लेकिन इसके बावजूद विपक्ष उस नाराजगी को बड़े जनआंदोलन में बदलने में सफल नहीं दिख रहा।
राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो भाजपा ने “राष्ट्रवाद + कानून व्यवस्था + हिंदुत्व + लाभार्थी योजना” का ऐसा समीकरण तैयार किया है, जिसने एंटी इनकम्बेंसी के असर को काफी हद तक सीमित कर दिया। उज्ज्वला, राशन, आवास और किसान सम्मान निधि जैसी योजनाओं का असर गरीब वर्ग में अब भी दिखाई देता है। यही कारण है कि नाराजगी होने के बावजूद वोट पूरी तरह विपक्ष की तरफ शिफ्ट नहीं हो रहा।
विपक्ष के सामने सबसे बड़ी चुनौती भरोसे की है। समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और अन्य दल लगातार सरकार को घेर रहे हैं, लेकिन जनता अब सिर्फ आरोप नहीं, विकल्प भी तलाश रही है। भाजपा विरोधी वोट बंटने का खतरा भी विपक्ष की कमजोरी बना हुआ है।
बीते लोकसभा चुनाव में बीजेपी अगर योगी की बात मान 30 सीटें बदल दी होतीं तो बड़ा नुकसान बच जाता, अंदरखाने माने तो इस बार भी बाबा करीब 150 टिकट बदलने के लिए कह चुके हैं।
प्रदेश की राजनीति का सबसे बड़ा सच यही है कि जनता अब भावनात्मक भाषणों से ज्यादा “एक्शन” देखना चाहती है। अगर सरकार सड़क, सुरक्षा और सिस्टम पर सख्ती दिखाती है तो आम आदमी कई शिकायतों के बावजूद उसे मौका देने को तैयार दिखता है। प्रदेश के कई जनपद ऐसे हैं जहां पर आम जन्मश में वहां के विधायक के प्रति खास रोष है जबकि मुख्यमंत्री और भारतीय जनता पार्टी के प्रति आज भी संवेदनशीलता है। दिन में कन्नौज फर्रुखाबाद शाहजहांपुर हरदोई एटा मैनपुरी के जिले तो बेहद चर्चा में है क्योंकि यहां पर सपा सरकार के दौरान प्रभावित लोग इस सरकार में भी बीते 9 वर्षों तक अपना प्रभाव छोड़ते रहे जिससे भाजपा का बह वर्ग ना खुश रहा जो तब उत्पीड़न का शिकार था और वह बदली सरकार में भी उत्पीड़न ही झेलता रहा।
यानी तस्वीर साफ है,विरोध है, नाराजगी है, सवाल भी हैं…लेकिन फिलहाल उत्तर प्रदेश में बीजेपी के खिलाफ गुस्सा उतना मजबूत नहीं दिख रहा, जितनी उसकी चर्चा राजनीतिक गलियारों में हो रही है।


