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Friday, May 8, 2026

परिवारवाद बनाम लोकतंत्र भारत रत्न अटल जी से मोदी-योगी तक

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भारतीय राजनीति में वंशवाद के खिलाफ सबसे बड़ा वैचारिक संघर्ष

यूथ इंडिया (शरद कटियार)
लखनऊ। भारतीय राजनीति में एक दौर ऐसा भी रहा जब दल विचारधारा से चलते थे, कार्यकर्ता संघर्ष से नेता बनते थे और राजनीति को राष्ट्रसेवा का माध्यम माना जाता था। लेकिन समय के साथ देश की बड़ी पार्टियां धीरे-धीरे परिवार केंद्रित सत्ता संरचनाओं में बदलती चली गईं। कई आंदोलनकारी नेताओं की विरासत उनके परिवारों तक सीमित होकर रह गई। ऐसे दौर में अटल बिहारी वाजपेई के बाद यदि किसी राजनीतिक धारा ने सबसे आक्रामक तरीके से परिवारवाद को चुनौती दी, तो उसमें नरेंद्र मोदी और योगी आदित्यनाथ सबसे प्रमुख चेहरे बनकर उभरे।
प्रधानमंत्री मोदी ने वर्षों पहले यह राजनीतिक संदेश दिया था कि लोकतंत्र परिवार की जागीर नहीं हो सकता। उन्होंने लगातार उन दलों पर हमला बोला जिनमें पार्टी संगठन, टिकट वितरण, सत्ता और नेतृत्व एक ही परिवार के इर्द-गिर्द घूमता रहा। मोदी का यह हमला केवल राजनीतिक नहीं बल्कि वैचारिक भी था। उनका तर्क साफ रहा कि परिवारवाद प्रतिभा को रोकता है, संगठन को कमजोर करता है और लोकतंत्र को सीमित परिवारों की निजी व्यवस्था में बदल देता है।
यही कारण है कि आज भारतीय राजनीति में वंशवाद सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा बन चुका है। कांग्रेस से लेकर समाजवादी राजनीति, क्षेत्रीय दलों से लेकर कई राष्ट्रीय पार्टियां तक इस बहस के केंद्र में हैं। विपक्षी दलों पर आरोप लगता रहा है कि वहां कार्यकर्ता की मेहनत से ज्यादा महत्व पारिवारिक रिश्तों को दिया जाता है।
योगी आदित्यनाथ ने भी उत्तर प्रदेश की राजनीति में खुद को ऐसे नेता के रूप में स्थापित किया जो व्यक्तिगत परिवार या राजनीतिक वंश की बजाय संगठन और प्रशासनिक सख्ती की राजनीति करते हैं। योगी की राजनीति का सबसे बड़ा संदेश यही रहा कि सत्ता वंश नहीं बल्कि कार्यशैली से चलनी चाहिए। यही वजह है कि भाजपा लगातार खुद को उन दलों के मुकाबले अलग बताने की कोशिश करती है जहां नेतृत्व पीढ़ी दर पीढ़ी परिवारों में हस्तांतरित होता रहा है।
भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी विडंबना यही रही कि जिन नेताओं ने जनता के लिए संघर्ष किया, उनके बाद राजनीतिक दल जनता के बजाय परिवारों के नियंत्रण में सिमटते चले गए। संगठन में नई पीढ़ी के कार्यकर्ताओं, वैचारिक नेताओं और जमीनी संघर्ष करने वालों के लिए जगह कम होती गई। परिणाम यह हुआ कि कई दलों में विचारधारा कमजोर और व्यक्तिपूजा मजबूत होती चली गई।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि परिवारवाद केवल राजनीतिक समस्या नहीं बल्कि लोकतांत्रिक संरचना की चुनौती है। जब पार्टी के भीतर लोकतंत्र खत्म होता है तो देश के लोकतंत्र पर भी उसका असर दिखाई देता है। यही वजह है कि भाजपा लगातार एक भारत, श्रेष्ठ भारत के साथ परिवारवाद मुक्त राजनीति का नैरेटिव खड़ा कर रही है।
हालांकि आलोचक यह भी कहते हैं कि केवल परिवारवाद विरोध का नारा पर्याप्त नहीं है। असली लोकतंत्र तब मजबूत होगा जब हर दल के भीतर आंतरिक लोकतंत्र, पारदर्शिता और वैचारिक बहस को भी समान महत्व मिलेगा। लेकिन यह भी सच है कि आज देश में परिवारवाद पर सबसे आक्रामक राजनीतिक हमला मोदी और योगी की राजनीति के केंद्र में दिखाई देता है।
देश की राजनीति अब एक बड़े मोड़ पर खड़ी है। एक तरफ परिवार आधारित दल हैं, दूसरी तरफ संगठन आधारित राजनीति का दावा। आने वाले वर्षों में तय होगा कि भारत की लोकतांत्रिक दिशा वंशवाद से संचालित होगी या फिर कार्यकर्ता आधारित राजनीतिक व्यवस्था मजबूत होगी।

राजनीति में अब नहीं होती राष्ट्र और लोकतंत्र की बात?
भारतीय राजनीति कभी विचारों, आंदोलनों और राष्ट्र निर्माण की बहसों पर खड़ी दिखाई देती थी। संसद से लेकर सडक़ों तक चर्चा होती थी राष्ट्रवाद की, लोकतंत्र की, संविधान की, किसानों की, युवाओं की और देश के भविष्य की। लेकिन समय बदला और राजनीति का केंद्र धीरे-धीरे राष्ट्र से हटकर परिवार, जाति, व्यक्तिगत सत्ता और चुनावी प्रबंधन तक सीमित होता चला गया। आज सबसे बड़ा संकट यही है कि राजनीति में राष्ट्र पीछे छूटता जा रहा है और परिवार आगे आता जा रहा है। एक समय था जब अटल बिहारी वाजपेई जैसे नेता संसद में बोलते थे तो राजनीतिक विरोधी भी सुनते थे, क्योंकि बहस सत्ता की नहीं बल्कि राष्ट्रहित की होती थी। चंद्रशेखर जैसे नेता पद से ज्यादा लोकतंत्र बचाने की लड़ाई लड़ते दिखाई देते थे। जयप्रकाश नारायण ने लोकतंत्र के लिए पूरी सत्ता व्यवस्था को चुनौती दी थी। लेकिन आज राजनीति की तस्वीर बदल चुकी है। अब दलों के भीतर विचारधारा से ज्यादा उत्तराधिकार की लड़ाई दिखाई देती है। राजनीतिक दल आंदोलन से नहीं बल्कि परिवारों से संचालित होने लगे हैं। टिकट से लेकर संगठन और सत्ता तक, सब कुछ सीमित चेहरों के इर्द-गिर्द सिमटता जा रहा है। यही कारण है कि राष्ट्रवाद और लोकतंत्र जैसे शब्द चुनावी भाषणों तक सीमित होकर रह गए हैं।

परिवारवाद की राजनीति ने निगल लिए आंदोलनकारी नेता!

विचारधारा हारी, जीत रहा वंशवाद, गर्त में जा रहा राष्ट्रवाद
लखनऊ। भारतीय राजनीति का इतिहास केवल सत्ता परिवर्तन का इतिहास नहीं है, बल्कि त्याग, संघर्ष, जेल यात्राओं, आंदोलनों और वैचारिक लड़ाइयों का भी इतिहास रहा है। इस देश ने ऐसे नेता देखे जिन्होंने अपनी पूरी जिंदगी राष्ट्र, लोकतंत्र और समाज के लिए समर्पित कर दी। लेकिन विडंबना यह है कि जिन नेताओं ने विचारधारा की राजनीति को खड़ा किया, उन्हीं की विरासत बाद में परिवारवाद की भेंट चढ़ती चली गई। आज स्थिति यह है कि नेता का नाम तो बचा है, लेकिन उसका मिशन, आंदोलन और वैचारिक संघर्ष लगभग खत्म हो चुका है।
जवाहरलाल नेहरू आधुनिक भारत के निर्माण के सबसे बड़े चेहरों में रहे। लोकतांत्रिक संस्थाओं, वैज्ञानिक सोच और संसदीय व्यवस्था की मजबूत नींव रखने का श्रेय उन्हें दिया जाता है। लेकिन समय के साथ कांग्रेस पार्टी विचारधारा से ज्यादा एक परिवार की राजनीतिक विरासत बनती चली गई। आज पार्टी की कमान राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा के हाथों में है, जबकि नेहरू की मूल वैचारिक पहचान विपक्ष और सत्ता दोनों की राजनीतिक लड़ाइयों में धुंधली होती जा रही है। देश में चाचा नेहरू की छवि अब बाल दिवस तक सीमित होकर रह गई है।
चंद्रशेखर जिन्हें युवा तुर्क और बलिया का शेर कहा गया, उन्होंने सत्ता से ज्यादा संघर्ष की राजनीति को महत्व दिया। उनकी राजनीति में वैचारिक साहस और व्यक्तिगत ईमानदारी दिखाई देती थी। लेकिन आज उनके नाम पर राजनीति करने वालों में वैसी वैचारिक प्रतिबद्धता नहीं दिखाई देती। उनके परिवार और राजनीतिक उत्तराधिकारियों पर यह आरोप लगते रहे हैं कि वे चंद्रशेखर की विचारधारा से ज्यादा उनकी राजनीतिक और संस्थागत विरासत पर केंद्रित हैं।
मुलायम सिंह यादव ने समाजवाद, किसान राजनीति और पिछड़ों की आवाज को राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित किया। उन्हें धरतीपुत्र कहा गया। लेकिन समय के साथ समाजवादी आंदोलन परिवार केंद्रित होता चला गया। आज अखिलेश यादव के नेतृत्व में पार्टी सक्रिय जरूर है, लेकिन आलोचक कहते हैं कि वह वैचारिक समाजवाद अब कमजोर पड़ चुका है जिसके लिए मुलायम सिंह ने संघर्ष किया था।
मायावती ने दलित राजनीति को नई शक्ति दी और भारतीय राजनीति में आयरन लेडी की छवि बनाई। बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय का नारा कभी सामाजिक परिवर्तन का बड़ा अभियान माना जाता था। लेकिन अब पार्टी के भीतर उत्तराधिकार और सीमित नेतृत्व को लेकर सवाल उठते रहे हैं। आलोचकों का मानना है कि आंदोलनकारी बहुजन राजनीति धीरे-धीरे व्यक्तिकेंद्रित संरचना में बदल गई।
लालू प्रसाद यादव ने सामाजिक न्याय की राजनीति को नई दिशा दी। मंडल राजनीति के दौर में वे पिछड़ों की सबसे मजबूत आवाज बने। लेकिन आज राष्ट्रीय जनता दल में परिवार की बढ़ती भूमिका को लेकर लगातार सवाल उठते हैं। विरोधियों का आरोप है कि आंदोलन की राजनीति अब परिवार आधारित सत्ता संरचना में बदल गई है।
ममता बनर्जी ने संघर्ष के दम पर वामपंथी किले को ढहाया और खुद को जननेता के रूप में स्थापित किया। लेकिन अब उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी की बढ़ती भूमिका को लेकर विपक्ष लगातार परिवारवाद का मुद्दा उठाता है।
भारतीय राजनीति का यह सबसे बड़ा विरोधाभास है कि जो नेता कभी वंशवाद और सत्ता के केंद्रीकरण के खिलाफ लड़ते दिखाई दिए, उनकी पार्टियां भी अंतत: परिवार आधारित ढांचे में सिमटती चली गईं। विचारधारा, संगठन और आंदोलन धीरे-धीरे व्यक्तियों और रिश्तेदारों के इर्द-गिर्द केंद्रित हो गए।
हालांकि राजनीतिक विश्लेषक यह भी मानते हैं कि केवल परिवार से आने वाला व्यक्ति अयोग्य नहीं होता। लोकतंत्र में अंतिम फैसला जनता का होता है। लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब संगठन के भीतर वैचारिक कार्यकर्ताओं और नए नेतृत्व के लिए रास्ते बंद हो जाते हैं। यही कारण है कि कई बड़े आंदोलन समय के साथ कमजोर होते चले गए।
आज देश की राजनीति के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या दल विचारधारा से चलेंगे या परिवार से? क्या आंदोलनकारी राजनीति फिर से संगठन आधारित बनेगी या राजनीतिक दल निजी विरासतों में बदलते रहेंगे? क्योंकि जब विचारधारा कमजोर होती है, तब राजनीति केवल सत्ता बचाने का माध्यम बनकर रह जाती है।

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