नई दिल्ली/मुंबई। भारतीय शेयर बाजार में इन दिनों एक ऐसा मामला चर्चा का केंद्र बना हुआ है, जिसने केवल निवेशकों ही नहीं बल्कि पूरे कॉर्पोरेट और नियामक ढांचे को कठघरे में खड़ा कर दिया है। ज्वेलरी और गोल्ड कारोबार की दिग्गज कंपनी राजेश एक्सपोर्ट्स पर बाजार नियामक सेबी ने आरोप लगाया है कि कंपनी ने वर्षों तक अपने राजस्व के आंकड़ों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया। मामला करीब ₹15.15 लाख करोड़ के कथित लेनदेन और वित्तीय रिपोर्टिंग से जुड़ा बताया जा रहा है।
यह आंकड़ा इतना बड़ा है कि कई राज्यों के वार्षिक बजट और देश की बड़ी कंपनियों के कारोबार को भी पीछे छोड़ देता है। ऐसे में सवाल केवल एक कंपनी तक सीमित नहीं रह गया, बल्कि पूरे कॉर्पोरेट गवर्नेंस सिस्टम की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लग गया है।
सेबी की जांच में आरोप है कि कंपनी ने अपनी वित्तीय रिपोर्टों में कारोबार और आय से जुड़े आंकड़ों को वास्तविकता से अधिक दिखाया। यदि आरोप सही साबित होते हैं तो यह भारतीय कॉर्पोरेट इतिहास के सबसे बड़े वित्तीय विवादों में शामिल हो सकता है।
हालांकि कंपनी ने आरोपों से इनकार किया है और अपना पक्ष रखने की बात कही है, लेकिन मामला सामने आते ही निवेशकों के बीच चिंता बढ़ गई है।
किसी भी सूचीबद्ध कंपनी की बैलेंसशीट और वित्तीय रिपोर्टों की जांच स्वतंत्र ऑडिटर करते हैं। यदि कई वर्षों तक वित्तीय आंकड़ों में कथित गड़बड़ियां होती रहीं तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि ऑडिट प्रक्रिया में यह मामला पकड़ में क्यों नहीं आया?
क्या ऑडिट केवल औपचारिकता बनकर रह गया है?
क्या बड़े कॉर्पोरेट समूहों की वित्तीय रिपोर्टों की जांच पर्याप्त कठोरता से नहीं हो रही?
यही सवाल अब बाजार विशेषज्ञ उठा रहे हैं।
राजेश एक्सपोर्ट्स जैसी बड़ी कंपनी विभिन्न बैंकों और वित्तीय संस्थानों के साथ कारोबार करती रही है। यदि कारोबार के आंकड़े वास्तविकता से अलग थे तो बैंकों की जोखिम मूल्यांकन प्रणाली ने इसे क्यों नहीं पकड़ा?
किसी भी कंपनी में निदेशक मंडल और स्वतंत्र निदेशक निवेशकों के हितों की रक्षा के लिए होते हैं। ऐसे में यह सवाल भी उठ रहा है कि यदि कोई अनियमितता थी तो बोर्ड स्तर पर उसे क्यों नहीं रोका गया?
विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला केवल अकाउंटिंग विवाद नहीं बल्कि कॉर्पोरेट गवर्नेंस की प्रभावशीलता की परीक्षा बन चुका है।


