कायमगंज। विश्व बंधु परिषद द्वारा डॉक्टर भीमराव अंबेडकर जयंती पर आयोजित संगोष्ठी में साहित्यकार प्रोफेसर रामबाबू मिश्र रत्नेश ने कहा कि डॉ अंबेडकर को दलितों का मसीहा कहा जाता है लेकिन वह अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त विधि विद्वान एवं राष्ट्रीय कद के नेता थे।
उन्होंने समाज में व्याप्त विषमताओं से आहत होकर सनातन हिंदू धर्म को तिलांजलि दे दी लेकिन उनके संविधान में बौद्ध ,जैन तथा सिख पंथों को हिंदू धर्म की शाखाएं माना गया इस गारंटी के साथ कि इनमें मतांतरण करने से संविधान द्वारा दी गई सुविधा बरकरार रहेगी। डॉ राजेंद्र प्रसाद की अध्यक्षता में गठित संविधान सभा ने प्रमुख जनतांत्रिक देशों के संविधानों का अध्ययन करने के बाद भारतीय संविधान का निर्माण किया जिसका संयोजन व लेखन डॉ अंबेडकर व उनकी टीम ने किया। विवाद की स्थिति में बाबा साहेब का निर्णय सर्वमान्य रहा।
पूर्व प्रधानाचार्य अहिवरन सिंह गौर ने कहा कि डॉ अंबेडकर को मानने के साथ ही यदि डॉक्टर अंबेडकर की भी मानी जाए तो अधिक लाभदायक होगा।
वीएस तिवारी ने कहा कि डॉक्टर अंबेडकर के समग्र साहित्य का निष्पक्ष अध्ययन किया जाए तो उनके किरदार को समझने में आसानी होगी।
प्रधानाचार्य शिवकांत शुक्ला ने कहा कि डॉक्टर अंबेडकर की प्रतिभा से प्रभावित होकर पंडित नेहरू ने राष्ट्रहित में उन्हें भारत का प्रथम कानून मंत्री बनाया था और वह भी वैचारिक मतभेद के बावजूद। छात्र यशवर्धन ने कहा-
पढ़ो बढ़ो और एक हो प्राप्त करो अधिकार
अपना दीपक खुद बनो करो आत्म उद्धार ।
युवा कवि अनुपम मिश्रा ने कहा-
बाबा साहब ने दिया बाबा साहब ने दिया यह संदेश महान
सिर्फ ज्ञान की सत्ता से संभव उत्थान
गोष्ठी में जेपी दुबे, एडवोकेट गौरव मिश्रा, रजनीश दीक्षित, शिवकुमार दुबे, मंजू मिश्रा, निधि मिश्रा , कीर्ति दुबे की सहभागिता रही । कार्यक्रम के अध्यक्षता पूर्व पोस्टमास्टर अल्लादीन मंसूरी ने की संचालन एडवोकेट परम मिश्रा ने किया।
अंतर्राष्ट्रीय विधि विद्वान थे डॉक्टर भीमराव अंबेडकर: प्रो.रत्नेश


