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Tuesday, July 7, 2026

चढ़ावा चोरी मामले में चंपत राय ने तोड़ी चुप्पी

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अयोध्या। श्रीराम जन्मभूमि मंदिर के चढ़ावा चोरी प्रकरण में पहली बार पूर्व महासचिव चंपत राय ने अपनी चुप्पी तोड़ी है। ट्रस्ट की बैठक में उनका इस्तीफा स्वीकार होने के एक दिन बाद मंगलवार को उन्होंने रामभक्तों के नाम एक खुला पत्र जारी कर कहा कि उनके खिलाफ लगाए जा रहे सभी आरोपों का जवाब वह विशेष जांच दल (SIT) की अंतिम रिपोर्ट आने के बाद क्रमवार देंगे। उन्होंने कहा कि फिलहाल जांच जारी है और अंतिम रिपोर्ट आने के बाद पूरा सच सामने आ जाएगा।

चंपत राय ने पत्र में कहा कि 7 जून 2026 को दानपात्र की गणना के दौरान हुई चोरी की घटना के बाद उनके खिलाफ कई तरह के आरोप लगाए गए, लेकिन उन्होंने जांच प्रभावित न हो, इसलिए अब तक मौन बनाए रखा। उन्होंने बताया कि 6 जुलाई को ट्रस्ट की बैठक में एसआईटी की प्रारंभिक रिपोर्ट प्रस्तुत की गई, जो अब सार्वजनिक हो चुकी है। उनका कहना है कि अंतिम जांच रिपोर्ट आने के बाद हर सवाल का तथ्यों के साथ जवाब देंगे।

इस बीच एसआईटी की प्रारंभिक जांच रिपोर्ट में कई गंभीर खुलासे सामने आए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, श्रीराम जन्मभूमि मंदिर के चढ़ावा गणना कक्ष में चोरी और गबन की घटनाएं पहली नजर में सही पाई गई हैं। उपलब्ध सीसीटीवी फुटेज में गणना कर्मियों द्वारा करीब 70 बार नोटों की गड्डियां और खुले नोट छिपाने की घटनाएं दर्ज होने का दावा किया गया है। जांच में यह भी सामने आया कि 27 अप्रैल 2026 से पहले भी अनियमितताएं होती रहीं, लेकिन उस अवधि का सीसीटीवी फुटेज उपलब्ध नहीं होने के कारण वास्तविक नुकसान का आकलन नहीं हो सका।

एसआईटी ने सुरक्षा व्यवस्था और निगरानी प्रणाली में गंभीर खामियां भी चिन्हित की हैं। रिपोर्ट के अनुसार, प्रवेश और निकास पर अनिवार्य तलाशी, निर्धारित ड्रेस कोड, निजी सामान पर रोक, मूल्यवर्ग के अनुसार गणना और प्रभावी निगरानी जैसी व्यवस्थाओं का सही तरीके से पालन नहीं किया गया। इसी लापरवाही के चलते चोरी की घटनाएं लगातार होती रहीं। जांच के आधार पर आठ लोगों के खिलाफ एफआईआर की संस्तुति की गई है, जबकि गणना कक्ष प्रभारी समेत अन्य जिम्मेदार कर्मियों के खिलाफ भी कार्रवाई की सिफारिश की गई है।

उधर, चंपत राय और ट्रस्टी डॉ. अनिल मिश्रा के इस्तीफे पर अयोध्या के कई संतों ने इसे नैतिक जिम्मेदारी के तहत उठाया गया कदम बताया। हालांकि कुछ संतों ने मांग की कि मंदिर प्रबंधन की निगरानी के लिए संतों की भागीदारी वाली एक स्वतंत्र समिति गठित की जाए, ताकि भविष्य में इस प्रकार के विवादों की पुनरावृत्ति न हो। संतों ने यह भी सवाल उठाया कि यदि प्रशासनिक लापरवाही हुई है तो जवाबदेही केवल एक-दो व्यक्तियों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए।

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