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Tuesday, July 7, 2026

पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर: सत्ता से बड़ा था उनका सिद्धांत

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पुण्यतिथि पर विशेष

लेखक: प्रो. एच. एन. शर्मा
(पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के राजनीतिक सलाहकार)

भारतीय राजनीति में कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं जो केवल अपने पद से नहीं, बल्कि अपने विचारों, सादगी और सिद्धांतों से इतिहास बनाते हैं। पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ऐसे ही विलक्षण नेता थे। उन्हें “युवा तुर्क” यूँ ही नहीं कहा गया था। उन्होंने सत्ता के सामने कभी अपने विचारों से समझौता नहीं किया और राजनीति को जनसेवा का माध्यम माना।

देश के प्रधानमंत्री बनने के बाद भी उनका जीवन आम भारतीय जैसा ही रहा। शायद विश्व के राजनीतिक इतिहास में ऐसे उदाहरण बहुत कम मिलते हैं कि कोई प्रधानमंत्री अपने लिए उपलब्ध सर्वोच्च सरकारी सुविधाओं का उपयोग न करे। चंद्रशेखर ने प्रधानमंत्री रहते हुए प्रधानमंत्री आवास को अपना स्थायी निवास नहीं बनाया। उन्होंने हमेशा भारत यात्रा केंद्र, गुड़गांव को ही अपना निवास माना। यह केवल सादगी नहीं थी, बल्कि सत्ता से विरक्ति और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति उनकी गहरी आस्था का प्रतीक था।

चंद्रशेखर का विश्वास था कि “भारत गाँवों में बसता है और गाँव का विकास ही हिंदुस्तान का वास्तविक विकास है।” उनका मानना था कि जब तक शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, सिंचाई, सड़क और संचार जैसी मूलभूत सुविधाएँ गाँवों तक नहीं पहुँचेंगी, तब तक भारत विकसित राष्ट्र नहीं बन सकता। उन्होंने हमेशा ग्रामीण भारत को देश की आत्मा माना और नीतियों का केंद्र भी गाँवों को बनाने की वकालत की।

उनकी ऐतिहासिक भारत यात्रा केवल एक राजनीतिक अभियान नहीं थी, बल्कि देश की आत्मा को समझने का प्रयास थी। हजारों किलोमीटर की पदयात्रा के दौरान उन्होंने किसानों, मजदूरों, युवाओं और आम नागरिकों के जीवन को निकट से देखा। इसी अनुभव ने उन्हें यह विश्वास दिलाया कि दिल्ली में बैठकर भारत को नहीं समझा जा सकता, भारत को समझने के लिए उसके गाँवों की धूल में चलना पड़ता है।

चंद्रशेखर लोकतंत्र में संवाद के प्रबल समर्थक थे। वे मानते थे कि विचारों का मतभेद लोकतंत्र की शक्ति है, कमजोरी नहीं। इसलिए वे राजनीतिक विरोधियों को भी सम्मान देते थे और सभी दलों के नेताओं के साथ बैठकर राष्ट्रीय मुद्दों पर चर्चा करने में विश्वास रखते थे। आज जब राजनीतिक संवाद का दायरा लगातार सिमटता दिखाई देता है, तब चंद्रशेखर की कार्यशैली और अधिक प्रासंगिक प्रतीत होती है।

आज की राजनीति में दलगत सीमाएँ इतनी कठोर होती जा रही हैं कि राष्ट्रीय हित के प्रश्नों पर भी सभी दलों का एक मंच पर बैठना कठिन होता जा रहा है। यह लोकतंत्र के लिए चिंता का विषय है। चंद्रशेखर का जीवन हमें सिखाता है कि सत्ता बदल सकती है, सरकारें बदल सकती हैं, लेकिन राष्ट्रहित सर्वोपरि होना चाहिए।

उन्होंने कभी पद को प्रतिष्ठा का साधन नहीं बनाया। उनके लिए राजनीति का अर्थ सत्ता प्राप्त करना नहीं, बल्कि समाज के अंतिम व्यक्ति तक न्याय और सम्मान पहुँचाना था। यही कारण है कि सीमित कार्यकाल के बावजूद उनका व्यक्तित्व भारतीय राजनीति में असाधारण सम्मान का स्थान रखता है।

आज उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें स्मरण करना केवल श्रद्धांजलि देना नहीं, बल्कि उनके विचारों को आत्मसात करने का अवसर भी है। यदि भारत को सशक्त, आत्मनिर्भर और समरस राष्ट्र बनाना है, तो गाँवों को विकास की मुख्यधारा में लाना होगा, लोकतांत्रिक संवाद को पुनर्जीवित करना होगा और राजनीति को फिर से जनसेवा का माध्यम बनाना होगा।

चंद्रशेखर का जीवन हमें यह संदेश देता है कि नेता की पहचान उसके पद से नहीं, बल्कि उसके सिद्धांतों से होती है। सादगी, वैचारिक स्पष्टता, राष्ट्रीय दृष्टि और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति अटूट निष्ठा ही उनकी सबसे बड़ी विरासत है।

उनकी पुण्यतिथि पर यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी कि हम उनके बताए मार्ग पर चलने का प्रयास करें और ऐसा भारत बनाने का संकल्प लें, जहाँ गाँव समृद्ध हों, लोकतंत्र संवादशील हो और राजनीति राष्ट्रहित के लिए समर्पित हो।

— प्रो. एच. एन. शर्मा
पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के राजनीतिक सलाहकार रहे हैं।

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