डॉ विजय गर्ग
जब पहली बारिश धरती को भिगोती है, तो
जब पहली बारिश धरती को भिगोती है, तो सिर्फ मिट्टीभर नहीं महकती बल्कि पूरा पारिस्थितिकी तंत्र नयी उम्मीदों के साथ सांस लेने लगता है। मानसून की पहली बारिश केवल मौसम का बदलाव नहीं है बल्कि जंगलों के लिए जीवन, ऊर्जा और आशा का नया अध्याय होता है।
भीषण गर्मी, सूखते जलस्रोतों और भोजन की कमी से जूझने के बाद मानसून की पहली बारिश वन्यजीवों के लिए किसी उत्सव से कम नहीं होते। आसमान से गिरती पहली बूंदों के साथ ही जंगल का पूरा जीवन जैसे नये सिरे से जाग उठता है। सूखी धरती पर हरियाली लौटने लगती है, सूखे नाले और पोखर फिर से पानी से भर जाते हैं और भजन की तलाश में भटक रहे जीवों को राहत मिलती है। हिरण, सांभर और नील गाय जैसी शाकाहारी प्रजातियों के लिए ताजी घास का नया भंडार भरने लगता है, वहीं शिकारी जीवों के लिए पारिस्थितिकी तंत्र संतुलित होने लगता है।
बादलों की गड़गड़ाहट के बीच मोर पंख फैलाकर नृत्य करने लगते हैं। पक्षियों के घोसले आबाद होने लगते हैं। मेढकों का सामूहिक स्वर जंगल में जीवन की वापसी का ऐलान करता है और कीट-पतंगे तथा तितलियां जो गर्मी में निष्क्रिय हो जाती हैं, फिर से सक्रिय हो उठती हैं। वास्तव में पहली बारिश केवल मौसम का परिवर्तनभर नहीं होता बल्कि जंगल के लिए पुनर्जन्म सरीखा होता है। यह वह समय है जब प्रकृति अपने करोड़ों जीवों को संदेश देती है कि संघर्ष का दौर बीत चुका है और अब जीवन, प्रजनन, विकास और आशा का नया युग आरंभ हो रहा है।
वन्यजीव विशेषज्ञों के मुताबिक क्योंकि वर्षा के साथ वनस्पतियों की वृद्धि हो जाती है, भोजन की उपलब्धता बढ़ जाती है और अनेक जीवों का प्रजनन चक्र शुरू हो जाता है। इसलिए जून और जुलाई को भारत के वन्यजीव कैलेंडर में सबसे महत्वपूर्ण महीनों में गिना जाता है। गर्मी में जानवरों को पानी और भोजन के लिए लंबी-लंबी दूरियां तय करनी पड़ती हैं। लेकिन पहली बारिश के साथ ही जंगलों मंे जीवनदायी ऊर्जा लौट आती है। नयी घास उगने लगती हैं, झाड़ियां हरी हो जाती है, जो कि शाकाहारी जीवों के लिए वरदान होती है। हिरण, चीतल, सांभर, नील गाय और जंगली खरगोश जैसे शाकाहारी जीव मानसून के दौरान भरपूर भोजन प्राप्त करते हैं, तो इनकी बेहतर सेहत का लाभ पूरी खाद्य शृंखला तंत्र को मिलता है। इस मौसम में बाघ, तेंदुआ और जंगली कुत्तों को पर्याप्त शिकार उपलब्ध होता है। मानसून का सबसे जीवंत प्रभाव तो पक्षियों पर दिखाई देता है।
भारत की ज्यादातर पक्षी प्रजातियां मानसून में ही प्रजनन करती हैं। इसलिए मानसून के शुरू होते ही पेड़ों की शाखाओं पर घोसले दिखने लगते हैं और जंगल नये पक्षियांे की आवाजों से गूंज उठता है। मेढकों जैसे उभयचरों के लिए भी यह मौसम सबसे अच्छा होता है। वर्षा आने के साथ ही सूखी धरती पर उनकी सक्रियता बढ़ जाती है। शाम होते ही जंगलों और खेतों में मेढकों की सामूहिक टर्र-टर्र की सुनाई पड़ती आवाज, वास्तव में उनके प्रजनन व्यवहार का हिस्सा होती है। यही समय उनकी अगली पीढ़ी के जन्म का भी होता है।
कीट-पतंगों की दुनिया भी मानूसन के साथ जीवंत हो उठती है। तितलियां, ड्रेगन फ्लाइ, बीटल और अनेक प्रकार के कीट, बड़ी संख्या में दिखाई देने लगते हैं। ये छोटे जीव केवल जैवविविधता का हिस्साभर नहीं होते बल्कि पक्षियों, कई तरह के सरीसृपों और अन्य जीवों के लिए भोजन का महत्वपूर्ण स्रोत होते हैं। इन दिनों सरीसृपों की गतिविधियां भी बढ़ जाती हैं। सांप, छिपकली और अन्य जीव बारिश के दौरान अधिक दिखायी देते हैं। अक्सर इन्हें खतरे के रूप में देखा जाता है। लेकिन वास्तविकता ये है कि बारिश के कारण इनके प्राकृतिक आवासों में पानी भर जाने का ये नतीजा होता है।
मानसून जंगलों की वनस्पतियों के लिए जीवन लेकर आता है। पेड़-पौधों में तेजी से विकास होता है। बीजों का अंकुरण बढ़ता है, नये पौधों का जन्म होता है और जंगलों के प्राकृतिक पुनर्जीवन का चक्र मजबूत होता है। यदि पर्याप्त वर्षा हो जाए तो जंगल आने वाले पूरे वर्ष के लिए अपनी जैविक उत्पादकता बढ़ा देते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में वन्यजीव संरक्षण की रणनीतियों में जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को विशेष रूप से शामिल करना होगा। मानसून हमें यह सिखाता है कि जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं होता बल्कि यह जीवंत और जटिल संसार है, यहां हर बारिश की बूंद हजारों जीवों के जीवन को प्रभावित करती है।
जब पहली बारिश धरती को भिगोती है, तो सिर्फ मिट्टीभर नहीं महकती बल्कि पूरा पारिस्थितिकी तंत्र नयी उम्मीदों के साथ सांस लेने लगता है। मानसून की पहली बारिश केवल मौसम का बदलाव नहीं है बल्कि जंगलों के लिए जीवन, ऊर्जा और आशा का नया अध्याय होता है।
डॉ विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रिंसिपल मलोट पंजाब


