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Monday, June 8, 2026

लौह पुरुष के बाद भाजपा का ‘शाह फैक्टर’ या भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा सत्ता शिल्पी?

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शरद कटियार

भारतीय राजनीति में कुछ नेता चुनाव लड़कर बड़े बनते हैं, कुछ जनसभाओं से पहचान बनाते हैं, लेकिन कुछ ऐसे भी होते हैं जो सत्ता के गलियारों में रहकर पूरे राजनीतिक परिदृश्य की दिशा बदल देते हैं। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह इसी श्रेणी के नेता हैं। आज भारतीय जनता पार्टी की चुनावी सफलता, संगठनात्मक मजबूती और सत्ता की निरंतरता की चर्चा अमित शाह के बिना अधूरी मानी जाती है।

गुजरात की धरती से निकला यह नेता आज उस मुकाम पर खड़ा है जहां उसके एक राजनीतिक फैसले का असर दिल्ली से लेकर गांव की चौपाल तक दिखाई देता है। भाजपा के भीतर उन्हें आधुनिक चाणक्य कहा जाता है, लेकिन उनके विरोधी उन्हें भाजपा की आक्रामक राजनीति का सबसे बड़ा चेहरा मानते हैं। सच शायद इन दोनों के बीच कहीं मौजूद है।

अमित शाह का राजनीतिक जीवन किसी राजनीतिक परिवार की विरासत से नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखाओं से शुरू हुआ। किशोरावस्था में संघ से जुड़ने वाले शाह ने संगठन के उस मॉडल को बहुत करीब से समझा, जिसमें व्यक्ति से ज्यादा महत्व विचार और संरचना को दिया जाता है। यही कारण है कि आज भी भाजपा के अंदर उन्हें नेता से ज्यादा संगठन निर्माता के रूप में देखा जाता है।

राजनीतिक जानकारों की मानें तो अमित शाह का असली उदय गुजरात की राजनीति में नहीं बल्कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में हुआ। 2013 में जब भाजपा ने उन्हें उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाया तो पार्टी यहां तीसरे-चौथे नंबर की ताकत मानी जा रही थी। जातीय समीकरणों में उलझे प्रदेश में भाजपा के लिए रास्ता आसान नहीं था। लेकिन अमित शाह ने बूथ प्रबंधन, सामाजिक इंजीनियरिंग और कार्यकर्ता नेटवर्क का ऐसा मॉडल तैयार किया कि 2014 का चुनाव भारतीय राजनीति का टर्निंग प्वाइंट बन गया।

उत्तर प्रदेश की 80 में से 71 सीटें जीतकर भाजपा ने न केवल केंद्र की सत्ता हासिल की बल्कि अमित शाह को राष्ट्रीय राजनीति का सबसे प्रभावशाली रणनीतिकार भी बना दिया। यहीं से भाजपा में ‘शाह फैक्टर’ शब्द प्रचलन में आया।

भाजपा के पुराने नेताओं का मानना है कि अमित शाह ने पार्टी की राजनीति को भावनात्मक नारों से निकालकर डेटा, प्रबंधन और सूक्ष्म रणनीति के दौर में पहुंचाया। बूथ अध्यक्ष से लेकर राष्ट्रीय नेतृत्व तक संवाद की जो संरचना उन्होंने बनाई, उसने भाजपा को चुनावी मशीन में बदल दिया।

लेकिन अमित शाह केवल चुनावी रणनीतिकार नहीं हैं। गृह मंत्री के रूप में उन्होंने उन फैसलों को लागू किया जिन्हें दशकों तक राजनीतिक दल केवल घोषणापत्रों में लिखते रहे। जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने का फैसला हो, नागरिकता संशोधन कानून लागू करना हो या फिर राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों पर सख्त रुख अपनाना हर बड़े फैसले में अमित शाह अग्रिम पंक्ति में दिखाई दिए।

यही वजह है कि भाजपा समर्थक उन्हें सरदार वल्लभभाई पटेल की प्रशासनिक परंपरा का उत्तराधिकारी बताते हैं। दिलचस्प बात यह है कि अमित शाह स्वयं भी कई अवसरों पर सरदार पटेल को अपनी राजनीतिक प्रेरणा मान चुके हैं। गुजरात की राजनीति से लेकर दिल्ली की सत्ता तक उनकी कार्यशैली में पटेल जैसी प्रशासनिक दृढ़ता की झलक देखने की बात भाजपा नेता अक्सर करते हैं।

हालांकि अमित शाह का राजनीतिक जीवन विवादों से मुक्त नहीं रहा। विपक्ष लगातार उन पर सत्ता के केंद्रीकरण, राजनीतिक आक्रामकता और जांच एजेंसियों के इस्तेमाल को लेकर सवाल उठाता रहा है। लेकिन यह भी सच है कि हर विवाद के बाद उनका राजनीतिक कद कम होने के बजाय बढ़ता ही गया।

आज भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल चुनाव जीतना नहीं, बल्कि देश के बदलते सामाजिक समीकरणों के बीच अपना राजनीतिक विस्तार बनाए रखना है। उत्तर प्रदेश में पिछड़ा वर्ग, गैर-यादव ओबीसी, दलित समाज और नए युवा मतदाताओं को जोड़ने की रणनीति के केंद्र में भी अमित शाह ही दिखाई देते हैं।

भाजपा संगठन में चल रहे बदलावों को भी राजनीतिक गलियारे अमित शाह की रणनीति से जोड़कर देख रहे हैं। पार्टी अब केवल पारंपरिक नेताओं के भरोसे नहीं रहना चाहती, बल्कि नए सामाजिक समूहों और युवा नेतृत्व को आगे लाने की तैयारी में है। माना जा रहा है कि आने वाले वर्षों में भाजपा का संगठनात्मक ढांचा और अधिक आक्रामक तथा परिणाम आधारित होने वाला है।

राजनीति में अक्सर कहा जाता है कि नेता चुनाव जिताते हैं, लेकिन संगठन सत्ता को स्थायी बनाता है। यदि यह बात सही है तो अमित शाह केवल भाजपा के नेता नहीं, बल्कि उस संगठनात्मक मॉडल के निर्माता हैं जिसने भा…

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