यूथ इंडिया
इस्लामाबाद इन दिनों एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के केंद्र में उभरता नजर आ रहा है। अमेरिका और ईरान के बीच संभावित बातचीत को लेकर जो संकेत मिल रहे हैं, उन्होंने वैश्विक राजनीतिक हलकों में नई हलचल पैदा कर दी है। हालांकि इस पूरे घटनाक्रम में जितनी गतिविधि दिखाई दे रही है, उतनी ही अस्पष्टता भी बनी हुई है। आधिकारिक बयानों और जमीनी हलचलों के बीच का अंतर इस बात को और जटिल बना रहा है।
सूत्रों के मुताबिक, ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची का पाकिस्तान दौरा इस कूटनीतिक गतिविधि का अहम हिस्सा माना जा रहा है। इसी बीच यह भी चर्चा है कि अमेरिका की ओर से कुछ प्रमुख प्रतिनिधियों के इस्लामाबाद आने की संभावना है। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि जहां अमेरिका इस संभावित वार्ता को लेकर सकारात्मक संकेत दे रहा है, वहीं ईरान ने किसी भी प्रत्यक्ष बातचीत की बात से साफ इनकार किया है। ईरानी पक्ष का कहना है कि यदि कोई संवाद होता भी है, तो वह सीधे तौर पर नहीं बल्कि किसी तीसरे देश के माध्यम से ही संभव होगा।
इस विरोधाभास ने पूरे मामले को और पेचीदा बना दिया है। एक ओर अमेरिका बातचीत के जरिए तनाव कम करने की बात कर रहा है, वहीं दूसरी ओर वह दबाव की रणनीति को भी जारी रखे हुए है। ईरान, अपनी संप्रभुता और राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देते हुए, किसी भी बाहरी हस्तक्षेप को स्वीकार करने के मूड में नहीं दिखता। ऐसे में पाकिस्तान की भूमिका एक संभावित मध्यस्थ के रूप में उभर रही है।
पाकिस्तान का यह कूटनीतिक प्रयास कोई नया नहीं है। अतीत में भी वह कई बार क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय विवादों में मध्यस्थ की भूमिका निभाने की कोशिश करता रहा है। हाल ही में अप्रैल महीने में अमेरिका और ईरान के बीच जो वार्ता हुई थी, उसमें भी पाकिस्तान की भूमिका महत्वपूर्ण मानी गई थी। हालांकि वह बातचीत लंबी चली, लेकिन किसी ठोस नतीजे तक नहीं पहुंच सकी। उस दौर में भी मुख्य विवादित मुद्दे—होर्मुज जलडमरूमध्य की सुरक्षा और ईरान का परमाणु कार्यक्रम—किसी सहमति तक नहीं पहुंच पाए थे।
वर्तमान परिदृश्य में भी यही मुद्दे केंद्र में हैं। अमेरिका चाहता है कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को सीमित करे और अंतरराष्ट्रीय निगरानी को स्वीकार करे। इसके अलावा, होर्मुज मार्ग की सुरक्षा को लेकर भी उसकी चिंताएं बनी हुई हैं, क्योंकि यह वैश्विक तेल आपूर्ति का एक अहम रास्ता है। दूसरी तरफ, ईरान इसे अपने अधिकार क्षेत्र का हिस्सा मानते हुए किसी भी प्रकार के नियंत्रण या दबाव को खारिज कर रहा है।
इस पूरे घटनाक्रम को और जटिल बनाने में अन्य वैश्विक शक्तियों की भूमिका भी कम नहीं है। अमेरिका जहां अपने रणनीतिक हितों के तहत दबाव और संवाद दोनों को साथ लेकर चल रहा है, वहीं रूस जैसे देश इस स्थिति पर अलग नजरिया रखते हैं। इससे कूटनीतिक समीकरण और अधिक उलझते जा रहे हैं।
ईरान के भीतर भी इस मुद्दे पर एकरूपता नहीं है। वहां एक धड़ा बातचीत के पक्ष में दिखाई देता है, जो मानता है कि कूटनीतिक रास्ते से समाधान संभव है। वहीं दूसरा धड़ा सख्त रुख अपनाने की वकालत करता है और किसी भी समझौते को कमजोरी के रूप में देखता है। इस आंतरिक मतभेद का असर भी बाहरी नीति पर साफ नजर आता है।
फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि इस्लामाबाद में कोई औपचारिक वार्ता आयोजित होगी या यह गतिविधियां केवल पर्दे के पीछे चल रहे कूटनीतिक संपर्कों तक सीमित रहेंगी। लेकिन इतना जरूर है कि इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह दिखा दिया है कि वैश्विक राजनीति में अनिश्चितता और रणनीतिक संतुलन किस तरह साथ-साथ चलते हैं।
अगर पाकिस्तान इस संवेदनशील स्थिति में सफलतापूर्वक मध्यस्थता कर पाता है, तो यह उसके लिए एक बड़ी कूटनीतिक उपलब्धि हो सकती है। वहीं, अगर यह प्रयास विफल रहता है, तो क्षेत्रीय तनाव और अधिक बढ़ने की आशंका भी बनी रहेगी। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या यह पहल किसी ठोस परिणाम तक पहुंचती है या फिर एक और अधूरी कोशिश बनकर रह जाती है।
कुल मिलाकर, अमेरिका और ईरान के बीच संवाद की यह सुगबुगाहट केवल दो देशों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका प्रभाव पूरे पश्चिम एशिया और वैश्विक राजनीति पर पड़ सकता है। ऐसे में हर कदम और हर बयान का महत्व और भी बढ़ जाता है।


