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Wednesday, August 12, 2026

आजादी की लड़ाई में सिंधियों का योगदान, विस्थापन की त्रासदी और नवनिर्माण का इतिहास

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 अशोक भाटिया , वसई

भारत का स्वतंत्रता संग्राम केवल भौगोलिक सीमाओं को मुक्त कराने की लड़ाई नहीं था, बल्कि यह देश के प्रत्येक कोने से उपजे राष्ट्रवाद और सामूहिक बलिदान की एक महागाथा थी। इस महागाथा में अखंड भारत के ‘सिंध प्रांत’ और सिंधी समाज का योगदान अत्यंत गौरवशाली, अद्वितीय और गहरे आत्मोत्सर्ग से भरा रहा है। सिंधु नदी की प्राचीन सभ्यता से सिंचित यह भूमि न केवल व्यापार और संस्कृति का केंद्र थी, बल्कि राष्ट्रभक्ति की चेतना की भी जननी रही है। अंग्रेजों के दमनकारी शासन के खिलाफ सिंध के वीरों ने जिस अदम्य साहस का परिचय दिया, वह भारतीय इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों में अंकित है। सिंधी समुदाय ने न केवल आजादी की वेदी पर अपने प्राणों की आहुति दी, बल्कि विभाजन की विभीषिका में अपना सब कुछ खोकर भी भारत माता के प्रति अपनी अटूट निष्ठा को बनाए रखा।

सिंध प्रांत में ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ क्रांति की ज्वाला शुरुआत से ही सुलग रही थी। 19वीं शताब्दी में ब्रिटिश नियंत्रण के बाद से ही स्थानीय स्तर पर प्रतिरोध शुरू हो गया था, जिसने 20वीं शताब्दी के आते-आते एक संगठित राष्ट्रीय आंदोलन का रूप ले लिया। स्वतंत्रता की इस लड़ाई में समाज के हर वर्ग—नेताओं, छात्रों, व्यापारियों और महिलाओं—ने अपनी सक्रिय भूमिका निभाई।
प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी और उनकी शहादत की गाथा हम 1. अमर शहीद हेमू कालानी (सिंध के भगत सिंह)से करते है ।सिंधी समाज के स्वतंत्रता संग्राम का जिक्र जब भी होता है, शहीद हेमू कालानी का नाम सबसे पहले और सबसे आदर के साथ लिया जाता है। अविभाजित भारत के सिंध प्रांत के सक्कर जिले में 23 मार्च 1923 को जन्मे हेमू कालानी बचपन से ही राष्ट्रभक्ति की भावना से ओतप्रोत थे। वे भगत सिंह की वीरता की कहानियों से अत्यधिक प्रभावित थे। मात्र 7 वर्ष की आयु में उन्होंने अपने मित्रों के साथ एक क्रांतिकारी टोली बनाई थी।
वर्ष 1942 में जब महात्मा गांधी ने ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ का शंखनाद किया, तो किशोर हेमू अपनी छात्र संस्था ‘स्वराज सेना’ के साथ इस आंदोलन में कूद पड़े। अक्टूबर 1942 में, उन्हें गुप्त सूचना मिली कि ब्रिटिश सेना हथियारों और बारूद से भरी एक विशेष ट्रेन लेकर सिंध के दमन के लिए आ रही है। हेमू कालानी ने अपने साथियों के साथ मिलकर रेलवे ट्रैक की फिश-प्लेटें खोलकर उस ट्रेन को पलटने की साहसिक योजना बनाई। कार्य को अंजाम देते समय ब्रिटिश पहरेदारों ने उन्हें देख लिया। अपने साथियों को सुरक्षित भगाने के बाद हेमू स्वयं पकड़े गए।
जेल में उन्हें भयानक यातनाएं दी गईं ताकि वे अपने सहयोगियों के नाम उगल दें, परंतु इस 19 वर्षीय वीर ने अपने मुंह से एक शब्द भी नहीं निकाला। मार्शल लॉ कोर्ट ने उन्हें मौत की सजा सुनाई। अपनी फांसी के फैसले पर जहां पूरा देश स्तब्ध और दुखी था, वहीं हेमू के चेहरे पर एक अलौकिक मुस्कान थी। 21 जनवरी 1943 को सक्कर जेल में हंसते-हंसते वे फांसी के फंदे पर झूल गए। उनकी इस महान शहादत के कारण उन्हें “सिंध का भगत सिंह” कहा जाता है।
जयरामदास दौलतराम-सिंध के एक और महान सपूत जयरामदास दौलतराम महात्मा गांधी के अत्यंत विश्वस्त और प्रमुख सहयोगियों में से एक थे। 1915 में डॉ. एनी बेसेंट की ‘होम रूल लीग’ से जुड़कर अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत करने वाले जयरामदास जी ने गांधीजी के हर बड़े आंदोलन का नेतृत्व सिंध में किया। वर्ष 1930 के नमक सत्याग्रह और 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान उन्होंने सिंध में जन-जागृति फैलाई और कई बार जेल गए। कराची में एक विरोध प्रदर्शन के दौरान पुलिस की बर्बर गोलीबारी में उनके पैर में गोली लगी थी, लेकिन उन्होंने तिरंगा झुकने नहीं दिया। वे ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ के संपादक भी रहे और अपनी कलम से राष्ट्रवाद की अलख जगाई। आजादी के बाद वे स्वतंत्र भारत के पहले खाद्य और कृषि मंत्री बने और बाद में बिहार व असम के राज्यपाल के रूप में देश की सेवा की।
3. आचार्य जे.बी. कृपलानी- हैदराबाद (सिंध) में जन्मे जीवतराम भगवानदास कृपलानी (आचार्य कृपलानी) भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के एक मुख्य मार्गदर्शक और बौद्धिक स्तंभ थे। चंपारण सत्याग्रह के समय से ही वे गांधीजी के साथ खड़े रहे। असहयोग आंदोलन और सविनय अवज्ञा आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाने वाले कृपलानी जी वर्ष 1947 में भारत की स्वतंत्रता के ऐतिहासिक समय पर ‘भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस’ के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे। उन्होंने देश की राजनीतिक दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
4. डॉ. चोइथराम गिडवानी और मौलाना उबैदुल्लाह सिंधी-डॉ. चोइथराम गिडवानी सिंध कांग्रेस के अध्यक्ष थे और उन्होंने देश की खातिर अपनी फलती-फूलती डॉक्टरी की प्रैक्टिस छोड़ दी और असहयोग आंदोलन में कूद पड़े। वहीं, मौलाना उबैदुल्लाह सिंधी जैसे क्रांतिकारी नेताओं ने विदेशों में जाकर भारत की आजादी के लिए रणनीतियां बनाईं और ब्रिटिश साम्राज्य की जड़ों को हिला कर रख दिया। इनके अलावा रूपलो कोल्ही जैसे लोकनायकों ने सिंध के थारपारकर क्षेत्र में अंग्रेजों की सेना से 16 वर्षों तक गुरिल्ला युद्ध लड़ा और देश के लिए अपना बलिदान दिया।

सिंधी समाज का योगदान केवल शारीरिक संघर्ष तक सीमित नहीं था। सिंधी समुदाय अपनी व्यापारिक कुशलता के लिए वैश्विक स्तर पर जाना जाता था। जब नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने विदेशों में भारत की मुक्ति के लिए ‘आजाद हिंद फौज’ का पुनर्गठन किया, तब उन्हें सेना के संचालन के लिए भारी धन की आवश्यकता थी। उस समय सुदूर पूर्व (मलेशिया, सिंगापुर, हांगकांग) और दुनिया के अन्य हिस्सों में स्थापित सिंधी व्यापारियों ने अपनी तिजोरियां नेताजी के लिए खोल दीं। सिंधी उद्योगपतियों और व्यापारियों द्वारा दिया गया यह विशाल वित्तीय सहयोग आजाद हिंद फौज की सफलता का एक मुख्य आधार बना। स्वतंत्रता के बाद आईएनए के वरिष्ठ अधिकारियों ने शहीद हेमू कालानी के परिवार को उनकी देशभक्ति के सम्मान में स्वर्ण पदक भेंट कर इस समाज के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की थी।

स्वतंत्रता के सूर्य का उदय सिंधी समुदाय के लिए एक ऐसी काली रात लेकर आया, जिसकी कल्पना किसी ने नहीं की थी। भारत की आजादी की कीमत सिंधी समाज को अपना सब कुछ देकर चुकानी पड़ी।पंजाब और बंगाल के विपरीत, सिंध प्रांत का कोई विभाजन नहीं हुआ; 1947 के विभाजन समझौते के तहत पूरा का पूरा सिंध प्रांत पाकिस्तान के हिस्से में दे दिया गया। इसके पीछे मुख्य कारण राजनीतिक समीकरण और भौगोलिक परिस्थितियां थीं, जहां गैर-मुस्लिम आबादी अल्पसंख्यक थी, यद्यपि वे आर्थिक और सांस्कृतिक रूप से अत्यंत सुदृढ़ थे।जब सिंध पाकिस्तान में चला गया, तो वहां रहने वाले हिंदू सिंधियों के सामने अचानक गहरे धार्मिक उत्पीड़न और अस्तित्व का संकट खड़ा हो गया। रातों-रात स्थितियां इतनी हिंसक और असुरक्षित हो गईं कि सिंधी हिंदुओं के पास अपनी जान और सम्मान बचाने के लिए अपनी पैतृक भूमि को छोड़ने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा।

सिंधी समुदाय को अपनी सदियों पुरानी समृद्ध विरासत, जमीनें, हवेलियां, फलते-फूलते व्यापारिक प्रतिष्ठान और पूजनीय सिंधु नदी के तटों को छोड़कर खाली हाथ भागना पड़ा। वे अपने ही देश में ‘शरणार्थी’ (Refugees) बन गए।विभाजन के समय लाखों सिंधी परिवार पानी के जहाजों और ट्रेनों के जरिए बंबई (मुंबई), गुजरात, राजस्थान और मध्य प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में पहुंचे। बंबई के पास स्थित सैन्य पारगमन शिविरों, जैसे कल्याण मिलिट्री कैंप (जो बाद में उल्हासनगर बना), में इन परिवारों को रखा गया। बैरकों और तंबुओं के उस कड़े और बंजर जीवन में बुनियादी सुविधाएं भी उपलब्ध नहीं थीं, जहां कभी महलों और समृद्ध हवेलियों में रहने वाले सिंधी श्रेष्ठियों को कतारों में लगकर राशन लेना पड़ता था। वे बिना किसी राज्य या प्रादेशिक भूमि के भारत में दरबदर हुए, क्योंकि भारत के नक्शे पर उनका अपना कोई राज्य (जैसे पंजाबियों के लिए पंजाब या बंगालियों के लिए बंगाल) नहीं बचा था।

अपनी जमीन और पहचान खोने के बाद सिंधी समाज ने जो कर दिखाया, वह आधुनिक विश्व इतिहास के सबसे प्रेरणादायी अध्यायों में से एक है। उन्होंने अपनी नियति पर आंसू बहाने के बजाय ‘पुरुषार्थ’ और ‘कठिन परिश्रम’ का रास्ता चुना।भारत आने के बाद सिंधी समुदाय ने किसी सरकारी खैरात या अत्यधिक सहायता की प्रतीक्षा नहीं की। उन्होंने छोटे-छोटे व्यापारों, फेरी लगाने और सिलाई-कढ़ाई जैसे कार्यों से नए सिरे से शुरुआत की। अपनी व्यापारिक कुशाग्रता, ईमानदारी और अदम्य इच्छाशक्ति के बल पर इस समाज ने भारत के व्यापारिक परिदृश्य को बदल कर रख दिया।आज स्थिति यह है कि सिंधी समुदाय भारत की कुल जनसंख्या का मात्र लगभग 1% है, लेकिन देश की अर्थव्यवस्था और सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में इनका योगदान लगभग 20% माना जाता है। भारत में ‘ओनरशिप फ्लैट सिस्टम’ (सहकारी आवास व्यवस्था) की शुरुआत का श्रेय सिंधी उद्योगपतियों (जैसे रहेजा ब्रदर्स और जेठी सिपहियामलानी) को जाता है, जिसने बंबई जैसे महानगर में आवास की समस्या को हल किया। भाई प्रताप जैसे दूरदर्शी नेताओं ने कच्छ के रेगिस्तान के पास आदिपुर और गांधीधाम जैसे जुड़वां शहरों तथा कांडला बंदरगाह के निर्माण में ऐतिहासिक योगदान दिया।

सिंधी समाज ने न केवल धन कमाया, बल्कि उसका एक बहुत बड़ा हिस्सा राष्ट्र के सामाजिक उत्थान में लगा दिया। भारत के विभिन्न राज्यों में फैले सिंधी धर्मार्थ ट्रस्टों द्वारा हजारों स्कूल, प्रतिष्ठित कॉलेज (जैसे मुंबई का जय हिंद कॉलेज, आर.डी. नेशनल कॉलेज), तकनीकी संस्थान और अत्याधुनिक अस्पताल (जैसे हिंदुजा अस्पताल, जसलोक अस्पताल , चोइथराम अस्पताल) संचालित किए जा रहे हैं। भारत के कुल चैरिटी फंडों में इस समाज का योगदान 62% के करीब आंका जाता है, जो उनकी परमार्थ भावना को दर्शाता है।

भले ही सिंधियों के पास भौगोलिक रूप से अपना कोई विशिष्ट राज्य नहीं है, लेकिन उन्होंने अपनी संस्कृति और पहचान को कभी मरने नहीं दिया। सिंधी समाज के लंबे संघर्षों और देश के प्रति उनके योगदानों के फलस्वरूप 10 अप्रैल 1967 को भारतीय संविधान की ‘आठवीं अनुसूची’ में सिंधी भाषा को एक आधिकारिक राष्ट्रीय भाषा के रूप में शामिल किया गया। हाल ही में भारत के उपराष्ट्रपति द्वारा सिंधी देवनागरी और मूल सिंधी लिपि दोनों में भारत के संविधान के अद्यतन संस्करण का विमोचन किया जाना इस समाज की भाषाई और सांस्कृतिक जीवंतता के प्रति राष्ट्र के सम्मान को प्रदर्शित करता है। देश के राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ में आज भी “सिंध” शब्द पूरी शान के साथ गूंजता है, जो भारत के अस्तित्व के साथ इस समाज के अटूट जुड़ाव का प्रतीक है।

आजादी की लड़ाई से लेकर आधुनिक भारत के निर्माण तक, सिंधी समाज की यात्रा ‘त्याग, संघर्ष और पुनरुत्थान’ की एक अद्भुत कहानी है। उन्होंने स्वतंत्रता के लिए अपने सबसे युवा क्रांतिकारी हेमू कालानी को फांसी के फंदे पर चढ़ते देखा, विभाजन में अपनी ऐतिहासिक मातृभूमि खोई, और बिना किसी प्रादेशिक राज्य के सहारे शरणार्थी शिविरों से अपने जीवन की नई शुरुआत की। लेकिन इस समाज ने कभी अपनी नियति को दोष नहीं दिया, बल्कि अपने पुरुषार्थ से भारत की आर्थिक, शैक्षिक और सैन्य शक्ति को सुदृढ़ किया। देश की रक्षा में ‘सिंध ब्रिगेड’ का पराक्रम और नौसेना प्रमुख के रूप में एडमिरल तहिलियानी की सेवाएं यह साबित करती हैं कि सिंधी समाज जितना व्यापार में कुशल है, उतना ही रणभूमि में भी वीर है। आज का सशक्त और समृद्ध भारत सिंधी समाज के इन महान बलिदानों और अद्वितीय योगदानों के बिना सर्वथा अपूर्ण है।

अशोक भाटिया,
वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार ,लेखक, समीक्षक एवं टिप्पणीकार
वसई पूर्व – 401208 ( मुंबई )E MAIL – vasairoad.yatrisangh@gmail.com व्हाट्स एप्प 9221232130

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