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Tuesday, June 2, 2026

विकास के नाम पर विनाश की कहानी क्या शहर अपने ही भविष्य को निगल रहे हैं?

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भारत की प्राचीन सिंधु घाटी सभ्यता को दुनिया की सबसे उन्नत शहरी सभ्यताओं में गिना जाता है। मोहनजोदड़ो और हड़प्पा की खुदाई में जिस जल निकासी व्यवस्था के प्रमाण मिले हैं, वे आज भी इंजीनियरों को हैरान करते हैं। उस समय घरों से निकलने वाले पानी को जमीन में समाहित करने और जल संरक्षण की ऐसी व्यवस्थाएं थीं, जो प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर चलती थीं।

विडंबना यह है कि पाँच हजार वर्ष बाद आधुनिक शहर उसी मूल सिद्धांत को भूलते जा रहे हैं। विकास की दौड़ में शहरों को कंक्रीट के जंगल में बदला जा रहा है। सड़कें, पार्किंग, फुटपाथ, आवासीय परिसर और व्यावसायिक भवन इस तरह बनाए जा रहे हैं कि वर्षा का पानी जमीन में समा ही नहीं पाता।

दक्षिण अफ्रीका का केपटाउन जल संकट इसका एक बड़ा उदाहरण माना जाता है। हालांकि केपटाउन का संकट केवल कंक्रीटीकरण से नहीं बल्कि लगातार कई वर्षों के सूखे, बढ़ती आबादी और जल प्रबंधन की चुनौतियों का परिणाम था, लेकिन इस घटना ने पूरी दुनिया को यह चेतावनी जरूर दी कि यदि वर्षा जल का संरक्षण नहीं किया गया तो बड़े शहर भी प्यासे हो सकते हैं।

भारत में भी यही खतरा तेजी से बढ़ रहा है। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के शहरों,गाजियाबाद, नोएडा, गुरुग्राम और दिल्ली में विशाल आवासीय परियोजनाओं के बीच खुली जमीन लगातार कम होती जा रही है। बरसात का अधिकांश पानी नालियों के माध्यम से शहर से बाहर चला जाता है, जबकि उसे जमीन में समाहित होना चाहिए था।

इसी सोच के साथ मनरेगा जैसी योजनाओं में तालाब, जलाशय, खेत-तालाब, चेकडैम और जल संरक्षण संरचनाओं को प्राथमिकता दी गई थी। इसका उद्देश्य केवल रोजगार देना नहीं था, बल्कि ग्रामीण भारत के भूजल स्तर को बचाना भी था। जहां इन योजनाओं को ईमानदारी से लागू किया गया, वहां जल स्तर में सुधार के सकारात्मक परिणाम भी देखने को मिले।

इंदिरापुरम जैसे आधुनिक आवासीय क्षेत्रों का दृश्य इस बहस को और प्रासंगिक बनाता है। बहुमंजिला इमारतें, चौड़ी सड़कें, इंटरलॉकिंग और सीमेंटेड सतहें विकास का प्रतीक तो दिखाई देती हैं, लेकिन प्रश्न यह है कि वर्षा का पानी आखिर जमीन में कहां जाएगा? यदि शहरों में जल पुनर्भरण (रीचार्ज) की पर्याप्त व्यवस्था नहीं होगी तो भविष्य में भूजल संकट और गंभीर हो सकता है।
वास्तविक विकास वह नहीं जो केवल सीमेंट और कंक्रीट बढ़ाए, बल्कि वह है जो प्रकृति और मानव आवश्यकताओं के बीच संतुलन स्थापित करे। आज आवश्यकता नई सड़कें बनाने से पहले वर्षा जल संचयन, रिचार्ज पिट, तालाबों के संरक्षण और खुली भूमि के संरक्षण पर गंभीरता से विचार करने की है।
अन्यथा आने वाली पीढ़ियां शायद यही पूछेंगी कि हमारे पूर्वजों ने विकास के नाम पर शहर तो बना दिए, लेकिन पानी बचाने की बुद्धिमानी क्यों छोड़ दी?
“जिस सभ्यता ने हजारों वर्ष पहले पानी को बचाने की कला सीख ली थी, आधुनिक भारत कहीं उसी ज्ञान को विकास की चमक में खो तो नहीं रहा?”

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