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Tuesday, July 21, 2026

बारिश से डूबते शहर, विकास मॉडल पर सवाल

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नालों की सफाई के दावों के बावजूद हर मानसून में क्यों थम जाती है शहरों की रफ्तार?

— सूर्या पंडित

बारिश प्रकृति का उत्सव है, लेकिन भारत के अधिकांश शहरों में यह उत्सव कुछ ही घंटों में आफत में बदल जाता है। पहली तेज बारिश होते ही सड़कें नदियों का रूप ले लेती हैं, कॉलोनियां जलमग्न हो जाती हैं, बाजार बंद होने लगते हैं और यातायात पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो जाता है। हर वर्ष वही दृश्य, वही दावे और वही सवाल—आखिर करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद भी शहर पानी में क्यों डूब जाते हैं?

यह केवल मौसम की मार नहीं, बल्कि वर्षों की अव्यवस्थित शहरी योजना और प्रशासनिक लापरवाही का परिणाम है।
भारत तेजी से शहरीकरण की ओर बढ़ रहा है। सरकारी अनुमानों के अनुसार अगले दो दशकों में देश की लगभग 40 प्रतिशत आबादी शहरों में रहने लगेगी। लेकिन जिस गति से शहर फैल रहे हैं, उसी गति से उनकी जल निकासी व्यवस्था विकसित नहीं हो रही। नाले पुराने हैं, सीवर क्षमता से अधिक दबाव झेल रहे हैं और प्राकृतिक जल निकासी मार्गों पर अतिक्रमण लगातार बढ़ रहा है।

हर वर्ष मानसून से पहले नगर निगम और नगर पालिकाएं नालों की सफाई के बड़े-बड़े दावे करती हैं। करोड़ों रुपये के टेंडर जारी होते हैं, मशीनें चलती हैं और प्रेस विज्ञप्तियां जारी होती हैं। लेकिन पहली ही बारिश इन दावों की वास्तविकता सामने ला देती है। यदि दो से तीन घंटे की बारिश किसी शहर को ठप कर दे, तो स्पष्ट है कि समस्या बारिश नहीं, व्यवस्था है।

शहरों में तेजी से हो रहे कंक्रीटीकरण ने भी संकट को बढ़ाया है। पहले बारिश का पानी जमीन में समा जाता था, लेकिन अब हर खाली जगह पर सीमेंट और डामर बिछ चुका है। परिणामस्वरूप पानी के पास बहने या रिसने का रास्ता नहीं बचता और वह सड़कों पर जमा होकर जनजीवन को प्रभावित करता है।

सबसे अधिक परेशानी आम नागरिक को उठानी पड़ती है। कार्यालय जाने वाले कर्मचारी घंटों जाम में फंसते हैं, व्यापारी कारोबार में नुकसान झेलते हैं, स्कूलों में अवकाश घोषित करना पड़ता है और अस्पताल पहुंचने वाले मरीजों तक को कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। कई बार जलभराव के कारण बिजली आपूर्ति प्रभावित होती है और दुर्घटनाओं का खतरा भी बढ़ जाता है।

केवल महानगर ही नहीं, छोटे और मध्यम शहर भी अब इसी समस्या से जूझ रहे हैं। बिना समुचित ड्रेनेज योजना के कॉलोनियां बस रही हैं। तालाबों और प्राकृतिक जल निकासी मार्गों पर निर्माण हो रहा है। बरसाती पानी के लिए बनाए गए रास्ते धीरे-धीरे खत्म होते जा रहे हैं। यह स्थिति भविष्य में और गंभीर संकट का संकेत है।

समाधान केवल नालों की सफाई तक सीमित नहीं है। शहरों के लिए दीर्घकालिक मास्टर ड्रेनेज प्लान, वर्षा जल संचयन, तालाबों और जलाशयों का संरक्षण, अतिक्रमण हटाना तथा आधुनिक जल निकासी प्रणाली विकसित करना समय की मांग है। हर निर्माण परियोजना में यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि वर्षा जल के सुरक्षित निकास की व्यवस्था पहले हो, निर्माण बाद में।

आज आवश्यकता केवल बजट बढ़ाने की नहीं, बल्कि बजट के प्रभावी उपयोग और जवाबदेही तय करने की है। जनता यह जानना चाहती है कि हर वर्ष जल निकासी पर खर्च होने वाला धन आखिर किस परिणाम तक पहुंचता है।
विकास का सही अर्थ केवल फ्लाईओवर, चौड़ी सड़कें और ऊंची इमारतें नहीं हैं। वास्तविक विकास वह है जिसमें पहली बारिश शहर की रफ्तार न रोक सके, नागरिक सुरक्षित रहें और प्रशासन को हर वर्ष एक जैसी चुनौतियों का सामना न करना पड़े।

यदि हर मानसून के साथ शहर डूबते रहेंगे, तो यह केवल प्राकृतिक आपदा नहीं कहलाएगी, बल्कि हमारी शहरी योजना की सबसे बड़ी विफलता मानी जाएगी। अब समय आ गया है कि बारिश को दोष देने के बजाय विकास मॉडल की समीक्षा की जाए, क्योंकि आधुनिक शहर वही है जो मौसम की चुनौती का सामना करने में सक्षम हो।

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