(डॉ. सुधाकर आशावादी -विनायक फीचर्स)
सामाजिक धरातल पर कहीं भी जातिगत भेदभाव या छुआछूत आधी सदी से नजर नहीं आया, किन्तु जब से अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति को विशेष सुविधाएं प्रदान करने के उद्देश्य से सिर्फ आरोपों के आधार पर बिना किसी जांच के आरोपियों को जेल भेजने का चलन शुरू हुआ है, तब से जातिगत भेदभाव का दिखावा अधिक होने लगा है।
यदि इस कानून के दुरुपयोग का वास्तविक आधार पर विश्लेषण किया जाए, तो स्पष्ट होगा कि कहीं न कहीं न्यायपालिका भी इसके दुरूपयोग में सहभागी है। पुलिस भीड़ के दवाब में तथ्यों की अनदेखी करके राजनीतिक तत्वों के हाथों की कठपुतली बनी रहती है। राजनीतिक तत्व अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति का मत व समर्थन पाने की आस में ऐसी परम्परा को जन्म दे रहे हैं, जिससे समाज के तथाकथित पिछड़ा व सवर्ण वर्ग का उत्पीड़न हो रहा है तथा फर्जी मुकदमों के चलते अनेक परिवार आर्थिक व सामाजिक रूप से पिछड़ रहे हैं तथा सरकारी उत्पीड़न से त्रस्त हो रहे हैं।
विगत पचपन- साठ वर्ष के सामाजिक जीवन में मैंने साझा परम्पराओं के निर्वहन में किसी भी प्रकार का ऐसा भेदभाव या छुआछूत नहीं देखा, जैसा भेदभाव तथाकथित दलित मीडिया तथा दलित चिंतकों द्वारा प्रदर्शित किया जा रहा है। जातीय आरक्षण के आधार पर समृद्ध हुए परिवार दलित समाज में अंतिम पायदान पर बैठे लोगों को बरगलाने के लिए हर सम्भव प्रयासरत हैं, क्योंकि उन्हें डर है कि चंद समृद्ध क्रीमीलेयर्स परिवारों को कहीं अपनी ही बिरादरी के हक़ की मलाई खाने से वंचित न होना पड़े।
बहरहाल स्थिति इतनी भयावह नहीं है, जितना कि इसे प्रचारित किया जा रहा है। प्राथमिक विद्यालय से लेकर उच्च शिक्षा संस्थानों में किसी भी स्तर पर जातिगत भेदभाव या छुआछूत जैसा आभास नहीं होता। बालकों की मित्रता में कहीं भी जातीय बंधन की भूमिका दिखाई नहीं देती। प्राथमिक शिक्षा से लेकर विश्वविद्यालय व सामाजिक जीवन में मानसिक स्तर व मानवीय पहलू मित्रता का आधार होते हैं। सार्वजनिक जीवन में उपयोगिता की सामग्री खरीदने के लिए व्यवसायी की जाति से किसी को कोई सरोकार नहीं होता। चाय की दुकान का स्वामी किस जाति का है, यह कभी नहीं पूछा जाता। चाट का खोमचा किस जाति का व्यक्ति लगा रहा है तथा आपको कौन स्वादिष्ट व्यंजन खिला रहा है, इसमें भी जब जाति आड़े नहीं आती, तब जातिगत छुआछूत के बढ़ने की बात को समाज में भला किस प्रकार स्वीकारा जा सकता है? साझा संस्कृति में विभिन्न पारिवारिक मांगलिक अवसरों पर समाज के सभी वर्गों की भागीदारी आदिकाल से रही है, किन्तु यदि सामाजिक समरसता को बढ़ावा देने वाली रीतियों पर जातिगत विद्वेष का ग्रहण लग जाए या फर्जी मुकदमें दर्ज करके समाज के बड़े वर्ग का उत्पीड़न हो, तो यह स्थिति सुशासन और कानून व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़ा करेगी ही। (विनायक फीचर्स)


