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Sunday, September 6, 2026

युवा रिपोर्ट कार्ड लेकर खड़ा है, प्रधानमंत्री आउट ऑफ रीच

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राजनीति में संवाद जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही महत्वपूर्ण यह भी है कि संवाद में सवालों के लिए कितनी जगह बची है। दिल्ली विश्वविद्यालय के श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स के शताब्दी समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का छात्रों से संवाद इसी कसौटी पर अब राजनीतिक बहस का विषय बन गया है। प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में बदलते भारत, युवा आकांक्षाओं, तकनीक, स्टार्टअप, अंतरिक्ष और नई अर्थव्यवस्था की संभावनाओं का उल्लेख किया। उन्होंने अपने पुराने एसआरसीसी भाषण को याद करते हुए यह बताने की कोशिश की कि बीते वर्षों में भारत कितना बदला है।

लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने इसी मंच और संबोधन को लेकर सवाल खड़ा कर दिया। उनका तंज था कि प्रधानमंत्री अपना रिपोर्ट कार्ड लेकर सामने आए, लेकिन देश का युवा भी अपना रिपोर्ट कार्ड लेकर खड़ा है। यही वह बिंदु है, जहां राजनीतिक भाषण और जमीनी हकीकत आमने-सामने खड़ी दिखाई देती है।

प्रधानमंत्री का दावा है कि भारत का युवा बड़े सपने देख रहा है और उसके सामने अवसरों की नई दुनिया खुल रही है। दूसरी ओर विपक्ष का सवाल है कि इन अवसरों तक पहुंच कितने युवाओं की है? कितने युवाओं को स्थायी रोजगार मिला? कितने युवाओं की शिक्षा पूरी होने के बाद उन्हें उनकी योग्यता के अनुरूप काम मिला? कितने युवाओं के सपने प्रतियोगी परीक्षाओं, बेरोजगारी और आर्थिक दबाव के बीच दम तोड़ रहे हैं?

यही असली बहस है।

सरकार की उपलब्धियों का अपना पक्ष है। डिजिटल भुगतान का विस्तार, स्टार्टअप संस्कृति, अंतरिक्ष क्षेत्र में निजी भागीदारी, बुनियादी ढांचे का विस्तार और नई तकनीक में भारत की बढ़ती भूमिका निश्चित रूप से ऐसे परिवर्तन हैं जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। लेकिन किसी भी सरकार का रिपोर्ट कार्ड केवल बड़ी परियोजनाओं और उपलब्धियों की सूची से तैयार नहीं होता। उसमें उस सामान्य नागरिक की स्थिति भी शामिल होती है, जो शिक्षा पूरी करने के बाद रोजगार की तलाश में भटक रहा है।

युवा केवल भाषण सुनने वाला वर्ग नहीं, बल्कि भविष्य का निर्णायक मतदाता और देश की सबसे बड़ी शक्ति है।

इसलिए युवाओं के बीच संवाद का अर्थ केवल यह बताना नहीं होना चाहिए कि सरकार ने क्या किया। संवाद का वास्तविक अर्थ यह भी है कि युवा सरकार से क्या पूछना चाहता है और उसके सवालों के कितने स्पष्ट जवाब दिए जा रहे हैं।

खड़गे का ‘आउट ऑफ रीच’ वाला तंज इसी राजनीतिक दूरी की ओर इशारा करता है। लोकतंत्र में सरकार और जनता के बीच दूरी जितनी कम होगी, लोकतांत्रिक व्यवस्था उतनी ही मजबूत होगी। प्रधानमंत्री का छात्रों के बीच जाना स्वागत योग्य है, लेकिन यह संवाद तभी सार्थक माना जाएगा जब छात्र अपनी असहमति भी खुलकर व्यक्त कर सकें और सरकार उन सवालों का जवाब देने के लिए तैयार हो।

राजनीतिक बहस का स्तर तब कमजोर पड़ता है, जब मूल सवालों की जगह व्यंग्य और राजनीतिक जुमले लेने लगते हैं। प्रधानमंत्री के संबोधन में ‘नाराज फूफा’ और ‘दिमागी नक्सल’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल विपक्ष पर राजनीतिक कटाक्ष के तौर पर किया गया। यह राजनीतिक रणनीति हो सकती है, लेकिन इससे यह सवाल खत्म नहीं होता कि देश का युवा रोजगार, शिक्षा, महंगाई और अवसरों को लेकर क्या महसूस कर रहा है।

विपक्ष भी इससे मुक्त नहीं है। सरकार की आलोचना करना उसका लोकतांत्रिक अधिकार और जिम्मेदारी है, लेकिन केवल सरकार की नाकामियां गिनाने से युवा संतुष्ट नहीं होगा। उसे यह भी जानना है कि विपक्ष सत्ता में आएगा तो रोजगार, शिक्षा, कौशल और आर्थिक अवसरों के लिए उसकी ठोस नीति क्या होगी।

आज का युवा राजनीतिक नारों से अधिक परिणाम चाहता है। उसे यह जानना है कि उसकी डिग्री के बाद नौकरी कहां है, प्रतियोगी परीक्षा का कैलेंडर समय पर क्यों नहीं चलता, भर्ती प्रक्रिया में देरी क्यों होती है, निजी क्षेत्र में गुणवत्तापूर्ण रोजगार कैसे बढ़ेगा और छोटे शहरों-कस्बों के युवाओं को महानगरों की ओर पलायन करने के लिए मजबूर क्यों होना पड़ता है।

यही कारण है कि युवा रिपोर्ट कार्ड आज केवल एक राजनीतिक मुहावरा नहीं, बल्कि लोकतंत्र के सामने खड़ा वास्तविक सवाल है।

सरकार अपना रिपोर्ट कार्ड दिखाए—यह लोकतंत्र की सामान्य प्रक्रिया है। लेकिन जनता भी अपना रिपोर्ट कार्ड दिखाए, यह लोकतंत्र की उससे भी महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। चुनावों में जनता सरकार के कामकाज का मूल्यांकन करती है और अपना फैसला सुनाती है।

प्रधानमंत्री का एसआरसीसी जाना इस मायने में महत्वपूर्ण है कि देश के युवाओं के साथ सीधा संवाद राजनीतिक नेतृत्व की प्राथमिकता होनी चाहिए। मगर संवाद एकतरफा प्रचार नहीं बनना चाहिए। विश्वविद्यालयों और शिक्षण संस्थानों को ऐसे स्थान बने रहना चाहिए जहां सरकार की उपलब्धियों पर तालियां भी बजें और नीतियों पर सवाल भी उठें।

आज जरूरत इस बात की है कि सत्ता और विपक्ष दोनों युवा प्रश्नों को राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से ऊपर उठाएं। रोजगार को चुनावी भाषण का विषय नहीं, राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाया जाए। शिक्षा को केवल डिग्री देने की व्यवस्था नहीं, बल्कि कौशल और अवसर से जोड़ने की रणनीति बनाया जाए। स्टार्टअप और नई अर्थव्यवस्था की सफलता का आकलन केवल आंकड़ों से नहीं, बल्कि इस आधार पर हो कि उनका लाभ छोटे शहरों और सामान्य परिवारों के युवाओं तक कितना पहुंचा।

क्योंकि भारत का भविष्य किसी एक सरकार का भविष्य नहीं है।

भारत का भविष्य उस युवा का भविष्य है, जो आज परीक्षा की तैयारी कर रहा है, नौकरी तलाश रहा है, अपना कारोबार शुरू करना चाहता है, तकनीक सीख रहा है या बेहतर जीवन के लिए शहर बदलने को मजबूर है।

प्रधानमंत्री अपना रिपोर्ट कार्ड लेकर आएं, विपक्ष अपना रिपोर्ट कार्ड लेकर आए और सबसे ऊपर—युवा अपना रिपोर्ट कार्ड लेकर खड़ा रहे।

लोकतंत्र में अंतिम फैसला उसी का होना चाहिए, क्योंकि सत्ता के गलियारों से कहीं अधिक महत्वपूर्ण देश के युवाओं की उम्मीदें हैं।

प्रधानमंत्री का युवाओं तक पहुंचना अच्छी बात है, लेकिन असली सफलता तब होगी जब युवा यह महसूस करे कि सत्ता भी उसकी आवाज तक पहुंच रही है।

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