शरद कटियार
जब संसद की आवाज़ सड़क पर उतर आए, तो यह केवल विपक्ष का नहीं, लोकतंत्र का भी सवाल बन जाता है
भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबी यह रही है कि यहां मतभेद को कभी देशद्रोह नहीं माना गया। सत्ता और विपक्ष के बीच तीखी बहसें हुईं, आंदोलन हुए, गिरफ्तारियां हुईं, लेकिन लोकतंत्र आगे बढ़ता रहा। मंगलवार को प्रधानमंत्री आवास के बाहर जो कुछ हुआ, उसने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या देश की राजनीति संवाद से दूर होकर टकराव की ओर बढ़ रही है?
छात्र आंदोलन से शुरू हुआ विवाद कुछ ही घंटों में राष्ट्रीय राजनीति का सबसे बड़ा मुद्दा बन गया। प्रधानमंत्री आवास के बाहर विपक्षी सांसद धरने पर बैठ गए। राहुल गांधी, प्रियंका गांधी, अखिलेश यादव, मल्लिकार्जुन खरगे समेत कई नेताओं की मौजूदगी ने इसे सिर्फ एक प्रदर्शन नहीं, बल्कि सत्ता और विपक्ष के बीच सीधे राजनीतिक संघर्ष का रूप दे दिया।
इसके बाद जो तस्वीरें सामने आईं, उन्होंने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को पुलिसकर्मी घेरकर ले जा रहे हैं, धक्का-मुक्की हो रही है, राहुल सड़क पर लेट जाते हैं, उनकी नाक से खून बहने की तस्वीरें सामने आती हैं। दूसरी ओर अखिलेश यादव मुस्कुराते हुए पुलिसकर्मियों से पूछते हैं—”अरे भईया… कहाँ ले जा रहे हो?” यह दृश्य केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक विमर्श का हिस्सा बन गया।
लोकतंत्र में सरकार की जिम्मेदारी केवल शासन चलाने की नहीं होती, बल्कि विरोध की आवाज़ को भी सुनने की होती है। वहीं विपक्ष की जिम्मेदारी केवल विरोध करना नहीं, बल्कि संवैधानिक मर्यादाओं के भीतर रहकर सरकार को जवाबदेह बनाना भी है। जब दोनों पक्ष अपनी-अपनी सीमाएं छोड़ देते हैं, तब लोकतंत्र सबसे अधिक कमजोर होता है।
सरकार का कहना है कि वह संसद में चर्चा के लिए तैयार थी और विपक्ष ने अपनी मांग बदल दी।
दूसरी ओर विपक्ष का आरोप है कि सरकार जवाबदेही से बच रही है और छात्रों की आवाज़ को दबाने के लिए पुलिस का सहारा ले रही है। इन दोनों दावों की सच्चाई राजनीतिक बहस का विषय हो सकती है, लेकिन एक तथ्य निर्विवाद है—यदि संसद के भीतर संवाद संभव नहीं होगा, तो सड़कें राजनीतिक संघर्ष का मंच बनेंगी।
यह पहली बार नहीं है जब विपक्षी नेताओं को हिरासत में लिया गया हो। आजादी के बाद से लगभग हर दौर में सत्ता और विपक्ष के बीच ऐसे टकराव हुए हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि आज सोशल मीडिया के दौर में हर तस्वीर और हर वीडियो कुछ ही मिनटों में करोड़ों लोगों तक पहुंच जाता है और राजनीतिक धारणा उसी गति से बनती-बिगड़ती है।
सबसे अधिक चिंता का विषय यह है कि इस पूरे विवाद का मूल मुद्दा,छात्रों की समस्याएं और शिक्षा व्यवस्था—राजनीतिक शोर में कहीं पीछे छूटता दिखाई दे रहा है। जिस आंदोलन की शुरुआत छात्रों के सवालों से हुई थी, वह अब पूरी तरह सत्ता और विपक्ष की राजनीतिक लड़ाई बन चुका है। सबसे बड़ा नुकसान उन्हीं युवाओं का है, जिनकी आवाज़ उठाने का दावा दोनों पक्ष कर रहे हैं।
लोकतंत्र की ताकत पुलिस की बैरिकेडिंग में नहीं, बल्कि संसद की बहस में होती है। यदि विपक्ष हर मुद्दे पर सड़क को प्राथमिकता देगा और सरकार हर विरोध का जवाब हिरासत से देगी, तो लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
अखिलेश यादव की गिरफ्तारी भी प्रतीकात्मक रूप से महत्वपूर्ण है। मुलायम सिंह यादव की राजनीति आंदोलनों और गिरफ्तारियों से निकली थी। अब अखिलेश यादव भी विपक्ष की राजनीति को सड़क तक ले जाने का संकेत दे रहे हैं। वहीं राहुल गांधी लगातार जन आंदोलनों के जरिए सरकार को चुनौती देने की रणनीति पर आगे बढ़ते दिखाई दे रहे हैं।
लेकिन लोकतंत्र किसी एक दल या एक नेता का नहीं होता। सत्ता बदलती रहती है, विपक्ष बदलता रहता है, चेहरे बदलते रहते हैं, पर लोकतांत्रिक संस्थाओं की गरिमा स्थायी होनी चाहिए। आज यदि विपक्ष के साथ कठोर व्यवहार पर सवाल उठ रहे हैं, तो कल सत्ता बदलने पर यही कसौटी दूसरी सरकार पर भी लागू होगी।
देश को टकराव नहीं, संवाद चाहिए। संसद को गतिरोध नहीं, समाधान चाहिए। छात्रों को राजनीति नहीं, न्याय चाहिए। और लोकतंत्र को ऐसी तस्वीरें नहीं, जिनमें निर्वाचित जनप्रतिनिधि और पुलिस आमने-सामने दिखाई दें। लोकतंत्र की जीत तब होगी, जब सरकार सवालों से नहीं डरेगी और विपक्ष जवाब सुनने का धैर्य भी रखेगा। यही संविधान की भावना है और यही भारत की लोकतांत्रिक परंपरा की सबसे बड़ी ताकत है।


