— शरद कटियार
जिस आंदोलन की शुरुआत छात्रों के भविष्य, परीक्षा व्यवस्था और शिक्षा सुधार की मांगों से हुई थी, वह कुछ ही दिनों में सत्ता और विपक्ष की राजनीतिक लड़ाई का अखाड़ा बन गया। अब बहस छात्रों के सवालों पर नहीं, बल्कि इस पर हो रही है कि किसे हिरासत में लिया गया, किसे चोट लगी और किसने किस पर आरोप लगाया।
यह विडंबना है कि जिन छात्रों की आवाज़ बनने का दावा सभी दल कर रहे हैं, वही छात्र सबसे पीछे छूट गए हैं।
देश में 1,100 से अधिक विश्वविद्यालय, 45,000 से ज्यादा कॉलेज और करोड़ों छात्र उच्च शिक्षा से जुड़े हैं। हर वर्ष लाखों युवा प्रतियोगी परीक्षाओं में शामिल होते हैं। परीक्षा की पारदर्शिता, भर्ती प्रक्रिया और शिक्षा की गुणवत्ता जैसे मुद्दे सीधे उनके भविष्य से जुड़े हैं। लेकिन जब आंदोलन राजनीति की चौखट पर पहुंचता है, तो मुद्दे अक्सर नारों के शोर में खो जाते हैं।
संसद में चर्चा होनी चाहिए थी,बहस नेताओं की गिरफ्तारी पर होने लगी। शिक्षा मंत्री से जवाब मांगा जाना चाहिए था,मुकाबला सरकार बनाम विपक्ष तक सिमट गया। छात्रों की मांगों का समाधान निकलना चाहिए था,लेकिन टीवी की बहसों में केवल राजनीतिक चेहरे दिखाई देने लगे।
सत्ता पक्ष विपक्ष पर राजनीति करने का आरोप लगा रहा है, जबकि विपक्ष सरकार पर छात्रों की आवाज़ दबाने का आरोप लगा रहा है। दोनों पक्ष अपने-अपने तर्क दे रहे हैं, लेकिन सबसे बड़ा सवाल वही है,क्या छात्रों की मूल मांगों पर कोई ठोस फैसला हुआ?
भारतीय लोकतंत्र में आंदोलन नई बात नहीं हैं। लेकिन इतिहास गवाह है कि जब भी किसी जनआंदोलन पर राजनीतिक दलों का वर्चस्व बढ़ा, तब मूल मुद्दा पीछे चला गया। यह खतरा आज भी साफ दिखाई दे रहा है। सरकार को यह समझना होगा कि युवाओं के सवालों का जवाब केवल पुलिस व्यवस्था से नहीं दिया जा सकता। वहीं विपक्ष को भी आत्ममंथन करना होगा कि क्या वह छात्रों की आवाज़ को आगे बढ़ा रहा है या उसे अपने राजनीतिक संघर्ष का माध्यम बना रहा है।
छात्रों को राजनीतिक मोहरा नहीं, न्याय चाहिए।उन्हें नारे नहीं, निष्पक्ष परीक्षाएं चाहिए।उन्हें गिरफ्तारियों की तस्वीरें नहीं, रोजगार और भरोसा चाहिए। अगर यह आंदोलन भी केवल राजनीतिक लाभ-हानि का हिसाब बनकर रह गया, तो हार किसी दल की नहीं होगी—हार उस युवा पीढ़ी की होगी, जिसकी उम्मीदों पर देश का भविष्य टिका है। सत्ता बदले या विपक्ष मजबूत हो जाए, इससे पहले यह तय होना चाहिए कि छात्र आंदोलन की असली जीत क्या होगी,राजनीतिक सुर्खियां या छात्रों को न्याय?


