शरद कटियार
भारत का लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं, बल्कि असहमति को सुनने और शांतिपूर्ण विरोध को सम्मान देने की परंपरा से भी मजबूत हुआ है। यही वह देश है जिसने दुनिया को महात्मा गांधी का सत्याग्रह दिया,एक ऐसा संघर्ष, जिसमें न हिंसा थी, न हथियार, केवल नैतिक बल था। आज जब जलवायु कार्यकर्ता और शिक्षाविद् सोनम वांगचुक लंबे उपवास पर हैं, तो बहस केवल उनके मुद्दों की नहीं, बल्कि इस प्रश्न की भी है कि क्या लोकतंत्र में गांधीवादी आंदोलन को सीमित या दबाने का प्रयास लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप है?
इतिहास गवाह है कि महात्मा गांधी ने 1917 से 1948 के बीच लगभग 17 प्रमुख उपवास किए। 1932 का येरवडा जेल उपवास छह दिन चला और उसके बाद पूना पैक्ट हुआ। 1947–48 में सांप्रदायिक हिंसा रोकने के लिए उनका उपवास राजनीतिक और सामाजिक नेतृत्व को वार्ता की मेज तक ले आया। ब्रिटिश सरकार ने कई बार गांधी को गिरफ्तार किया, लेकिन उनके उपवासों और सत्याग्रहों का उत्तर अंततः प्रशासनिक कार्रवाई के साथ-साथ राजनीतिक संवाद से भी दिया गया। गांधी के आंदोलन ने दुनिया को यह संदेश दिया कि नैतिक शक्ति, दमन से अधिक प्रभावशाली हो सकती है।
भारत का संविधान भी इसी भावना को प्रतिबिंबित करता है। अनुच्छेद 19(1)(ए ) नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है और अनुच्छेद 19(1)(बी ) शांतिपूर्ण एवं निःशस्त्र सभा करने का अधिकार प्रदान करता है। ये अधिकार पूर्ण नहीं हैं और कानून के तहत उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं, लेकिन लोकतंत्र की कसौटी यही है कि असहमति का उत्तर यथासंभव संवाद से दिया जाए, न कि केवल प्रशासनिक उपायों से।
भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में शांतिपूर्ण आंदोलनों की लंबी परंपरा रही है। जयप्रकाश नारायण का आंदोलन, अन्ना हज़ारे का 2011 का जनलोकपाल आंदोलन, किसानों के लंबे धरने और अनेक सामाजिक अभियानों ने दिखाया कि लोकतांत्रिक दबाव से नीतियों पर पुनर्विचार हो सकता है। कई बार सरकारों ने विरोध किया, कई बार आंदोलनकारियों ने भी अपने रुख में बदलाव किया, लेकिन अंततः समाधान की दिशा बातचीत ही बनी।
सोनम वांगचुक का आंदोलन भी इसी परंपरा के संदर्भ में देखा जा रहा है। उनके समर्थक इसे लोकतांत्रिक अधिकारों का प्रयोग मानते हैं, जबकि सरकार और प्रशासन कानून-व्यवस्था तथा सार्वजनिक हित से जुड़े अपने दायित्वों का हवाला दे सकते हैं। किसी भी लोकतंत्र में यही संतुलन सबसे कठिन परीक्षा होता है,एक ओर नागरिक का विरोध का अधिकार और दूसरी ओर राज्य की जिम्मेदारी।
यह भी याद रखना चाहिए कि लोकतंत्र में किसी आंदोलन से सहमत या असहमत होना अलग बात है, लेकिन आंदोलन के अधिकार का सम्मान करना अलग। यदि शांतिपूर्ण विरोध की जगह संवाद कम होता जाएगा, तो अविश्वास बढ़ेगा। दूसरी ओर, यदि आंदोलन भी केवल टकराव का माध्यम बन जाए और समाधान की संभावनाओं से दूर चला जाए, तो उसका उद्देश्य भी कमजोर पड़ सकता है।
भारत ने दुनिया को सत्याग्रह की ताकत दिखाई है। इसलिए आज भी आवश्यकता इसी बात की है कि मतभेदों को लोकतांत्रिक संस्थाओं, न्यायिक प्रक्रिया और सार्थक संवाद के माध्यम से सुलझाया जाए। किसी भी लोकतंत्र की मजबूती उसकी आलोचना सहने की क्षमता से मापी जाती है, न कि केवल उसके समर्थन से।
लोकतंत्र की असली जीत तब होती है जब सत्ता सवालों से डरती नहीं, उन्हें सुनती है और आंदोलन केवल विरोध नहीं, समाधान की दिशा में भी रास्ता बनाते हैं। यही गांधी की विरासत है और यही भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति भी।


