उत्तर प्रदेश की राजनीति में पिछले कुछ वर्षों में यदि किसी एक मुद्दे ने सबसे अधिक प्रभाव डाला है, तो वह है “कानून व्यवस्था”। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सत्ता संभालने के बाद जिस “जीरो टॉलरेंस” नीति और सख्त प्रशासनिक मॉडल की शुरुआत की थी, उसकी असली परीक्षा हमेशा संवेदनशील धार्मिक अवसरों पर होती रही है। इस बार बकरीद का पर्व केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि सरकार की प्रशासनिक क्षमता, राजनीतिक इच्छाशक्ति और सामाजिक संतुलन की बड़ी परीक्षा बन गया था।
उत्तर प्रदेश जैसे विशाल, संवेदनशील और विविधताओं से भरे राज्य में बकरीद जैसे त्योहार के दौरान शांति व्यवस्था बनाए रखना आसान नहीं माना जाता। प्रदेश के कई जिले पहले सांप्रदायिक तनाव और छोटी घटनाओं के कारण सुर्खियों में रहे हैं। सोशल मीडिया के दौर में अफवाहें मिनटों में माहौल बिगाड़ सकती हैं। ऐसे में इस बार जिस स्तर की प्रशासनिक तैयारी दिखाई गई, उसने साफ कर दिया कि योगी सरकार कानून व्यवस्था के मुद्दे पर किसी भी प्रकार की ढिलाई के मूड में नहीं थी।
राजधानी लखनऊ से लेकर संभल, मुरादाबाद, बरेली, आगरा, मेरठ, अलीगढ़ और प्रयागराज जैसे संवेदनशील जिलों में प्रशासन पूरी तरह अलर्ट मोड पर नजर आया। करीब दो लाख से अधिक पुलिसकर्मी, पीएसी और सुरक्षा बलों की तैनाती केवल सुरक्षा व्यवस्था नहीं बल्कि सरकार का एक स्पष्ट राजनीतिक संदेश भी था कि प्रदेश में अब “सिस्टम पहले” की नीति लागू है। ड्रोन कैमरों, सीसीटीवी नेटवर्क, कंट्रोल रूम मॉनिटरिंग और सोशल मीडिया सर्विलांस के जरिए प्रशासन ने आधुनिक तकनीक को कानून व्यवस्था का अहम हिस्सा बना दिया। भाजपा इसे “नए उत्तर प्रदेश” की तस्वीर के रूप में प्रस्तुत कर रही है।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की राजनीति का मूल केंद्र हमेशा “सख्त प्रशासन” रहा है। उनके समर्थक मानते हैं कि उन्होंने उत्तर प्रदेश में कानून व्यवस्था को केवल प्रशासनिक विषय नहीं बल्कि राजनीतिक बहस का मुख्य मुद्दा बना दिया। यही वजह है कि हर बड़े धार्मिक आयोजन के दौरान सरकार अपनी प्रशासनिक क्षमता को एक मॉडल के रूप में पेश करती है। बकरीद का शांतिपूर्ण सम्पन्न होना भी उसी राजनीतिक और प्रशासनिक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
हालांकि केवल पुलिस बल और सख्ती से शांति कायम नहीं रहती। किसी भी लोकतंत्र में सामाजिक संतुलन, आपसी विश्वास और संवाद की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है। इस बार मौलानाओं, उलेमाओं, स्थानीय धर्मगुरुओं और शांति समितियों ने जिस संयम और जिम्मेदारी का परिचय दिया, वह भी उतना ही अहम रहा। मस्जिदों और ईदगाहों से लगातार अमन, भाईचारे और देश की खुशहाली की दुआएं दी गईं। लोगों ने एक-दूसरे से गले मिलकर यह संदेश दिया कि त्योहार विभाजन नहीं बल्कि सामाजिक एकता का प्रतीक होते हैं।
इस पूरे घटनाक्रम का राजनीतिक पहलू भी बेहद महत्वपूर्ण है। भाजपा अब “सुरक्षित उत्तर प्रदेश” की छवि को अपने सबसे मजबूत राजनीतिक नैरेटिव के रूप में स्थापित करने में जुटी हुई है। पार्टी यह संदेश देने का प्रयास कर रही है कि योगी सरकार केवल विकास योजनाओं तक सीमित नहीं बल्कि सुरक्षा, नियंत्रण और प्रशासनिक अनुशासन के मामले में भी मजबूत और निर्णायक है। आने वाले चुनावों में यह छवि भाजपा के लिए बड़ा राजनीतिक हथियार साबित हो सकती है।
लेकिन किसी भी सरकार की असली सफलता केवल त्योहार शांतिपूर्ण ढंग से सम्पन्न कराने में नहीं होती, बल्कि इस बात में होती है कि समाज में विश्वास और न्याय का वातावरण स्थायी रूप से कायम रहे। यदि प्रशासनिक सख्ती के साथ संवेदनशीलता, संवाद और निष्पक्षता भी बनी रहे, तभी कानून व्यवस्था जनता के मन में भरोसा पैदा करती है।
फिलहाल इतना तय है कि इस बार बकरीद का शांतिपूर्ण सम्पन्न होना योगी सरकार के लिए बड़ी प्रशासनिक उपलब्धि और राजनीतिक सफलता के रूप में देखा जा रहा है। उत्तर प्रदेश ने एक बार फिर यह संदेश देने की कोशिश की है कि सख्त प्रशासन और सामाजिक सहयोग साथ चलें तो संवेदनशील से संवेदनशील पर्व भी अमन और भाईचारे के साथ सम्पन्न हो सकते हैं।


