– समझिए टैक्स और कीमत का पूरा गणित
– टैक्स के बोझ से महंगा ईंधन, जीएसटी लागू हुआ तो मिल सकती है बड़ी राहत
यूथ इंडिया | शरद कटियार
नई दिल्ली। पेट्रोल और डीजल की लगातार बढ़ती कीमतों के बीच एक बार फिर देश में बड़ा सवाल उठने लगा है कि आखिर कब पेट्रोल-डीजल को जीएसटी के दायरे में लाया जाएगा। आम जनता महंगे ईंधन से परेशान है, जबकि सरकारें टैक्स से होने वाली भारी कमाई छोड़ने को तैयार नहीं दिखाई देतीं।
देश में पेट्रोल और डीजल की कीमतें केवल कच्चे तेल पर निर्भर नहीं होतीं, बल्कि उस पर लगने वाले भारी टैक्स कीमतों को आसमान तक पहुंचा देते हैं। यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल सस्ता होने के बावजूद भारत में आम आदमी को राहत नहीं मिल पाती।
वर्तमान समय में पेट्रोल और डीजल पर केंद्र सरकार एक्साइज ड्यूटी वसूलती है, जबकि राज्य सरकारें वैट और अतिरिक्त सेस लगाती हैं। कई राज्यों में टैक्स इतना अधिक है कि एक लीटर पेट्रोल की वास्तविक कीमत से ज्यादा हिस्सा टैक्स का हो जाता है।
विशेषज्ञों के अनुसार यदि पेट्रोल और डीजल को 28 प्रतिशत जीएसटी स्लैब में लाया जाए तो देशभर में ईंधन की कीमतों में भारी गिरावट संभव है। अनुमान है कि पेट्रोल करीब 20 से 30 रुपये प्रति लीटर तक सस्ता हो सकता है, जबकि डीजल की कीमतों में 15 से 25 रुपये तक की कमी आ सकती है।
मान लीजिए किसी शहर में पेट्रोल की बेस कीमत लगभग 48 रुपये प्रति लीटर है। इसके बाद केंद्र सरकार एक्साइज ड्यूटी जोड़ती है, फिर राज्य सरकार वैट और सेस लगाती है। डीलर कमीशन जुड़ने के बाद यही पेट्रोल 95 से 110 रुपये प्रति लीटर तक पहुंच जाता है।
यानी उपभोक्ता जो कीमत चुका रहा है, उसका लगभग आधा हिस्सा टैक्स के रूप में सरकारों के पास जाता है। यही वजह है कि पेट्रोल-डीजल सरकारों के लिए “कमाई का सबसे बड़ा स्रोत” माने जाते हैं।
यदि पेट्रोल और डीजल को जीएसटी के तहत लाया गया और अधिकतम 28 प्रतिशत टैक्स लगाया गया, तो कीमतों में बड़ा बदलाव दिखाई दे सकता है।
संभावित गणित कुछ इस प्रकार हो सकता है पेट्रोल की कीमत लगभग 70 से 75 रुपये प्रति लीटर,डीजल की कीमत लगभग 65 से 70 रुपये प्रति लीटर।
हालांकि अलग-अलग राज्यों के वर्तमान टैक्स ढांचे के अनुसार इसमें थोड़ा अंतर हो सकता है।
असल समस्या सरकारों की आय से जुड़ी है। पेट्रोल-डीजल पर मिलने वाला टैक्स केंद्र और राज्यों दोनों की कमाई का बड़ा जरिया है। यदि यह जीएसटी में शामिल हो गया तो राज्यों की आय में भारी कमी आ सकती है।
यही कारण है कि जीएसटी काउंसिल में इस मुद्दे पर अब तक आम सहमति नहीं बन पाई है। कई राज्य सरकारें चाहती हैं कि यदि पेट्रोल-डीजल जीएसटी में आए तो उनके राजस्व नुकसान की भरपाई की गारंटी दी जाए।
हर बार जब पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ते हैं तो जीएसटी में शामिल करने की मांग तेज हो जाती है। विपक्ष सरकार पर टैक्स के जरिए जनता से “अत्यधिक वसूली” का आरोप लगाता है, जबकि सरकारें विकास कार्यों और राजस्व जरूरतों का हवाला देती हैं।
लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि महंगे ईंधन का असर केवल वाहन मालिकों तक सीमित नहीं रहता। पेट्रोल-डीजल महंगा होते ही ट्रांसपोर्ट खर्च बढ़ता है और इसका असर खाने-पीने की चीजों से लेकर निर्माण सामग्री तक हर वस्तु पर दिखाई देता है।
यानी पेट्रोल-डीजल की कीमतें केवल आर्थिक नहीं, बल्कि राजनीतिक और सामाजिक मुद्दा भी बन चुकी हैं।


