नई दिल्ली। वैवाहिक रिश्तों में पैदा होने वाले हर मनमुटाव को अपराध नहीं माना जा सकता। देश की सर्वोच्च अदालत ने एक अहम फैसले में यह स्पष्ट कर दिया है कि पति द्वारा कुछ दिनों तक पत्नी से बात न करना अपने आप में कानूनी रूप से “क्रूरता” नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने पत्नी की आत्महत्या से जुड़े एक मामले में दोषी ठहराए गए पति को बरी करते हुए कहा कि वैवाहिक जीवन में असहमति, नाराजगी या सीमित अवधि तक संवादहीनता को धारा 498ए के तहत मानसिक क्रूरता नहीं माना जा सकता।
मामले में आरोप था कि पति ने करीब 13 दिनों तक पत्नी से बातचीत नहीं की थी। इसके बाद पत्नी ने आत्महत्या कर ली। निचली अदालत और उच्च न्यायालय ने इस व्यवहार को मानसिक प्रताड़ना मानते हुए पति को दोषी ठहराया था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने दोनों अदालतों के फैसलों को पलटते हुए कहा कि किसी व्यक्ति को केवल अनुमान और भावनात्मक निष्कर्षों के आधार पर अपराधी नहीं ठहराया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि दहेज उत्पीड़न और क्रूरता जैसे गंभीर आरोपों में दोषसिद्धि के लिए ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य जरूरी हैं। केवल यह तथ्य कि पति-पत्नी के बीच कुछ दिनों तक बातचीत बंद रही, किसी को अपराधी साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है। अदालत ने कहा कि विवाह एक संवेदनशील सामाजिक संस्था है और उसमें होने वाले हर विवाद को आपराधिक मुकदमे का आधार नहीं बनाया जा सकता।
यह फैसला ऐसे समय आया है जब दहेज उत्पीड़न और वैवाहिक प्रताड़ना से जुड़े मामलों में लगातार मुकदमे दर्ज हो रहे हैं। कानूनी जानकारों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय न्यायिक संतुलन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। इससे यह संदेश गया है कि कानून का इस्तेमाल वास्तविक पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए होना चाहिए, न कि कमजोर या अपर्याप्त साक्ष्यों के आधार पर किसी को दोषी ठहराने के लिए।
सुप्रीम कोर्ट ने साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि जहां दहेज मांग, शारीरिक हिंसा, मानसिक उत्पीड़न या आत्महत्या के लिए उकसाने के स्पष्ट प्रमाण मौजूद हों, वहां कानून पूरी सख्ती से लागू होगा। लेकिन केवल वैवाहिक तनाव या कुछ दिनों की चुप्पी को क्रूरता का पर्याय नहीं माना जा सकता।
अदालत के इस फैसले को वैवाहिक विवादों और दहेज कानून से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण नजीर माना जा रहा है, जिसका असर आने वाले समय में देशभर की अदालतों में चल रहे ऐसे मुकदमों पर भी पड़ सकता है।


