शरद कटियार
देश की संसद में जब पेपर लीक जैसे गंभीर मुद्दे पर चर्चा होती है तो यह केवल राजनीतिक बहस का विषय नहीं रहता, बल्कि करोड़ों युवाओं की उम्मीदों, मेहनत और भविष्य से जुड़ा राष्ट्रीय प्रश्न बन जाता है। लोकसभा में समाजवादी पार्टी की सांसद डिंपल यादव द्वारा केंद्र सरकार पर किए गए तीखे हमले ने एक बार फिर इस समस्या को राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में ला दिया है।
डिंपल यादव ने सदन में सवाल उठाया कि आखिर देश में लगातार हो रहे पेपर लीक के लिए जिम्मेदार कौन है? उन्होंने यहां तक कहा कि क्या यह केवल प्रशासनिक विफलता है या इसके पीछे कोई सुनियोजित व्यवस्था काम कर रही है। यह एक गंभीर राजनीतिक आरोप है, जिसका उत्तर तथ्यों और जांच के आधार पर ही दिया जा सकता है। लेकिन इससे अलग एक सच्चाई ऐसी है, जिस पर किसी का मतभेद नहीं हो सकता,पेपर लीक ने लाखों युवाओं का भरोसा तोड़ा है।
आज देश का युवा वर्षों तक कठिन परिश्रम करता है। परिवार अपनी बचत कोचिंग, किताबों और रहने-खाने पर खर्च करता है। कई छात्र आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं। जब परीक्षा का प्रश्नपत्र लीक हो जाता है या परीक्षा रद्द होती है, तब केवल एक परीक्षा नहीं रुकती, बल्कि हजारों परिवारों के सपने भी टूट जाते हैं। यही कारण है कि पेपर लीक की हर घटना छात्रों के भीतर गहरा अविश्वास और निराशा पैदा करती है।
लोकसभा में डिंपल यादव ने यह भी कहा कि कई छात्रों ने निराशा में आत्महत्या तक कर ली। यदि ऐसी घटनाएं हुई हैं तो यह केवल कानून-व्यवस्था या परीक्षा प्रणाली का नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए चिंता का विषय है। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में युवाओं का विश्वास सबसे बड़ी पूंजी होता है। यदि वही विश्वास कमजोर पड़ने लगे तो यह देश के भविष्य के लिए शुभ संकेत नहीं माना जा सकता।
सांसद ने यह आरोप भी लगाया कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे छात्रों के साथ बल प्रयोग किया गया और उनकी आवाज को दबाने की कोशिश हुई। लोकतंत्र में विरोध और अपनी मांग रखना प्रत्येक नागरिक का अधिकार है। साथ ही यह भी आवश्यक है कि हर प्रदर्शन कानून और शांति की सीमाओं के भीतर रहे। सरकार की जिम्मेदारी है कि वह छात्रों की बात सुने और कानून-व्यवस्था बनाए रखते हुए संवेदनशील रवैया अपनाए।
हालांकि, संसद में लगाए गए आरोपों का दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। सरकार का कहना है कि पेपर लीक रोकने के लिए कानून को और कठोर बनाया जा रहा है तथा दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। यदि ऐसा है तो उसका प्रभाव केवल कानून की किताबों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि दोषियों की शीघ्र गिरफ्तारी, त्वरित सुनवाई और कठोर दंड के रूप में दिखाई देना चाहिए। जब तक पेपर माफिया के पूरे नेटवर्क को खत्म नहीं किया जाएगा, तब तक नए कानून भी अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाएंगे।
आज आवश्यकता राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से आगे बढ़ने की है। परीक्षा प्रणाली को पूरी तरह तकनीक आधारित, पारदर्शी और सुरक्षित बनाना होगा। प्रश्नपत्र तैयार करने से लेकर वितरण, परीक्षा संचालन और मूल्यांकन तक हर चरण में ऐसी व्यवस्था विकसित करनी होगी, जिसमें मानवीय हस्तक्षेप कम से कम हो और जवाबदेही स्पष्ट हो। साथ ही, यदि किसी परीक्षा में लापरवाही या भ्रष्टाचार साबित होता है तो संबंधित अधिकारियों और संस्थाओं की व्यक्तिगत जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।
पेपर लीक केवल एक प्रशासनिक समस्या नहीं, बल्कि युवाओं के विश्वास की परीक्षा है। यदि मेहनत करने वाले छात्र यह महसूस करने लगें कि सफलता योग्यता से नहीं बल्कि अवैध तरीकों से तय होती है, तो यह पूरे समाज के लिए खतरे की घंटी है। इसलिए यह मुद्दा किसी एक दल या सरकार का नहीं, बल्कि देश के भविष्य का है।
संसद में हुई बहस का सबसे सकारात्मक परिणाम तभी होगा, जब इससे राजनीति नहीं बल्कि ऐसी नीतियां निकलें जो हर छात्र को यह भरोसा दिला सकें कि उसकी मेहनत, ईमानदारी और प्रतिभा ही उसकी सफलता का आधार बनेगी। देश के युवाओं को भाषणों से अधिक निष्पक्ष परीक्षा प्रणाली और न्यायपूर्ण व्यवस्था की आवश्यकता है।


