पटना। बिहार की राजधानी पटना के ज्ञान भवन में आयोजित जॉब फेयर ने देश में बढ़ती बेरोजगारी और युवाओं की बेचैनी की तस्वीर एक बार फिर सामने ला दी है। तीन दिनों तक चलने वाले इस रोजगार मेले में करीब 62 हजार युवा पहुंच गए। हालात ऐसे रहे कि हर तरफ सिर्फ युवाओं की भीड़ दिखाई दी। कोई रिज्यूमे हाथ में लिए लाइन में खड़ा था तो कोई इंटरव्यू हॉल के बाहर घंटों इंतजार करता नजर आया।
यह भीड़ किसी सरकारी भर्ती परीक्षा की नहीं, बल्कि प्राइवेट नौकरी पाने की उम्मीद में जुटे युवाओं की थी। यही वजह है कि यह जॉब फेयर अब केवल रोजगार कार्यक्रम नहीं बल्कि देश के रोजगार संकट पर बड़ा सवाल बन गया है।
बिहार लंबे समय से पलायन और बेरोजगारी की मार झेलता रहा है। सरकारी नौकरियों की सीमित संख्या और भर्ती प्रक्रियाओं में देरी के कारण अब बड़ी संख्या में युवा निजी क्षेत्र की नौकरियों की ओर रुख कर रहे हैं। जॉब मेले में शामिल कई युवाओं ने कहा कि वे वर्षों से प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं, लेकिन भर्ती प्रक्रिया लंबी और अनिश्चित होने के कारण अब प्राइवेट सेक्टर में अवसर तलाश रहे हैं।
इस रोजगार मेले में देश की कई निजी कंपनियों ने हिस्सा लिया। टेक्निकल, सेल्स, मार्केटिंग, कस्टमर सर्विस और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में नौकरियों के लिए इंटरव्यू आयोजित किए गए। हालांकि बड़ी संख्या में पहुंचे युवाओं के मुकाबले उपलब्ध नौकरियां बेहद कम मानी जा रही हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि 62 हजार युवाओं का एक साथ प्राइवेट नौकरी के लिए पहुंचना देश की बदलती आर्थिक और सामाजिक स्थिति का संकेत है। पहले जहां युवा सरकारी नौकरी को ही स्थायी भविष्य मानते थे, वहीं अब परिस्थितियां उन्हें निजी क्षेत्र की ओर धकेल रही हैं।
आंकड़ों के अनुसार बिहार देश के उन राज्यों में शामिल है जहां युवा आबादी सबसे अधिक है, लेकिन उद्योग और बड़े निवेश की कमी के कारण रोजगार के अवसर सीमित हैं। यही वजह है कि हर साल लाखों युवा दिल्ली, महाराष्ट्र, गुजरात और दक्षिण भारत के राज्यों की ओर पलायन करते हैं।
जॉब फेयर में उमड़ी भारी भीड़ ने यह भी साफ कर दिया कि देश में रोजगार अब सबसे बड़ा राजनीतिक और सामाजिक मुद्दा बन चुका है। आने वाले चुनावों में बेरोजगारी और युवाओं का भविष्य राजनीतिक दलों के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन सकता है।


