शरद कटियार
पटना के ज्ञान भवन में उमड़ी 62 हजार युवाओं की भीड़ केवल एक जॉब फेयर का दृश्य नहीं थी, बल्कि यह देश के उस मौन संकट की तस्वीर थी जिसे सरकारें आंकड़ों और घोषणाओं के पीछे छिपाने की कोशिश करती रही हैं। हाथों में रिज्यूमे, आंखों में उम्मीद और चेहरे पर बेचैनी लिए हजारों युवा नौकरी की तलाश में घंटों लाइन में खड़े रहे। यह भीड़ बताती है कि भारत का युवा अब केवल रोजगार नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व और सम्मान की लड़ाई लड़ रहा है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है कि करोड़ों रुपये खर्च कर डिग्रियां हासिल करने वाले युवा आज मामूली निजी नौकरियों के लिए भी भीड़ का हिस्सा बनने को मजबूर हैं? कभी सरकारी नौकरी भारतीय मध्यम वर्ग के लिए स्थिरता और सम्मान का प्रतीक मानी जाती थी, लेकिन अब भर्ती परीक्षाओं में देरी, पेपर लीक, वर्षों तक अटकी नियुक्तियां और सीमित पदों ने युवाओं का भरोसा तोड़ दिया है।
बिहार जैसे राज्यों की स्थिति और अधिक गंभीर है। यहां प्रतिभा की कमी नहीं, लेकिन अवसरों का घोर अभाव है। उद्योग नहीं, बड़े निवेश नहीं, रोजगार पैदा करने वाली ठोस नीतियां नहीं। परिणाम यह हुआ कि बिहार का युवा वर्षों से पलायन के लिए मजबूर है। दिल्ली की फैक्ट्रियों से लेकर गुजरात के उद्योगों और दक्षिण भारत की कंपनियों तक बिहार के युवा अपनी मेहनत बेचते दिखाई देते हैं।
विडंबना यह है कि चुनावी मंचों पर युवाओं को “देश का भविष्य” बताया जाता है, लेकिन जब रोजगार की बात आती है तो वही युवा सरकारी फाइलों और राजनीतिक भाषणों के बीच कहीं खो जाता है। हर चुनाव में करोड़ों नौकरियों के वादे किए जाते हैं, लेकिन जमीन पर स्थिति यह है कि निजी नौकरी के एक मेले में 62 हजार युवाओं की भीड़ जुट जाती है। यह संख्या केवल बेरोजगारी नहीं, बल्कि व्यवस्था पर अविश्वास का संकेत है।
एक और चिंताजनक पहलू यह है कि अब युवा “करियर” नहीं बल्कि “कोई भी नौकरी” तलाश रहा है। इंजीनियर सेल्समैन बनने को तैयार है, ग्रेजुएट कस्टमर केयर की नौकरी के लिए लाइन में है और पोस्टग्रेजुएट डेटा एंट्री ऑपरेटर बनने को मजबूर है। यह केवल आर्थिक संकट नहीं बल्कि सामाजिक असंतुलन की शुरुआत भी है। जब पढ़ा-लिखा युवा खुद को असुरक्षित महसूस करने लगता है तो उसके भीतर व्यवस्था के प्रति आक्रोश पैदा होना स्वाभाविक है।
सरकारें अक्सर स्टार्टअप, स्किल इंडिया और आत्मनिर्भरता जैसे बड़े नारों की बात करती हैं, लेकिन हकीकत यह है कि छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों में रोजगार का ढांचा अभी भी बेहद कमजोर है। वहां न पर्याप्त उद्योग हैं, न निवेश और न ही ऐसा माहौल जहां युवा अपने सपनों को आकार दे सके।
आज जरूरत केवल जॉब फेयर आयोजित करने की नहीं, बल्कि ऐसी आर्थिक नीति की है जो रोजगार पैदा करे। छोटे और मध्यम उद्योगों को बढ़ावा देना होगा, स्थानीय स्तर पर निवेश बढ़ाना होगा और भर्ती प्रक्रियाओं को पारदर्शी एवं समयबद्ध बनाना होगा। वरना आने वाले समय में बेरोजगारी केवल आर्थिक समस्या नहीं रहेगी, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक अस्थिरता का कारण भी बन सकती है।
पटना का यह जॉब फेयर एक चेतावनी है। यह उन करोड़ों युवाओं की आवाज है जो कहना चाहते हैं कि उन्हें भाषण नहीं, अवसर चाहिए; वादे नहीं, रोजगार चाहिए। क्योंकि जब किसी देश का युवा ही असुरक्षित भविष्य के अंधेरे में खड़ा हो जाए, तो विकास के सारे दावे खोखले लगने लगते हैं।
डिग्री हाथ में, भविष्य अधर में: आखिर नौजवान जाए तो जाए कहां?


