लंदन। भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि डिजिटल अरेस्ट जैसे नए और गंभीर आर्थिक अपराधों से निपटने के लिए न्यायपालिका सक्रिय भूमिका निभाती है। ऐसे मामलों में न्यायपालिका संसद के कानून बनाने का इंतजार नहीं करती। उन्होंने कहा कि उच्चतम न्यायालय ने डिजिटल अरेस्ट के बढ़ते मामलों पर स्वतः संज्ञान लेकर कार्रवाई की है।
लंदन में आयोजित 43वें अंतरराष्ट्रीय आर्थिक अपराध सम्मेलन के समापन समारोह में मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि डिजिटल अरेस्ट के मामलों में ठग वीडियो कॉल के जरिए खुद को पुलिस, न्यायिक अधिकारी या सरकारी अधिकारी बताकर लोगों को डराते हैं और उनसे पैसे ऐंठते हैं। उच्चतम न्यायालय ने दिसंबर 2025 में इस मामले पर स्वतः संज्ञान लिया था। न्यायालय ने केंद्र और राज्यों से इस समस्या का आकलन करने, इसे अलग अपराध के रूप में शामिल करने और अपराध के अनुपात में सजा तय करने की दिशा में कदम उठाने को कहा था।
मुख्य न्यायाधीश ने धन शोधन कानून के दुरुपयोग से जुड़ी शिकायतों का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि गिरफ्तार व्यक्ति को गिरफ्तारी के कारण लिखित रूप में बताना जरूरी है। केवल मौखिक रूप से कारण बताना पर्याप्त नहीं है। उन्होंने अरविंद केजरीवाल मामले का उल्लेख करते हुए कहा कि किसी व्यक्ति को लंबे समय तक मुकदमे से पहले हिरासत में रखना सजा में नहीं बदलना चाहिए।
उन्होंने कहा कि अवैध धन को वापस लाना दुनिया के सामने बड़ी चुनौती है। आर्थिक अपराध अक्सर एक देश से दूसरे देश तक पहुंच जाते हैं, इसलिए इनके खिलाफ कार्रवाई में अंतरराष्ट्रीय सहयोग जरूरी है। दूसरे देशों के साथ कानूनी सहायता समझौते अवैध संपत्ति और धन वापस लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
भ्रष्टाचार पर उन्होंने करीब 2300 वर्ष पुराने कौटिल्य के अर्थशास्त्र का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि उस समय भी सरकारी धन के दुरुपयोग और भ्रष्टाचार का उल्लेख मिलता है। मुख्य न्यायाधीश ने जोर दिया कि आर्थिक अपराधों से निपटने के लिए मजबूत कानून, निष्पक्ष जांच और देशों के बीच बेहतर सहयोग जरूरी है।


